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Showing posts from October, 2020

इंसान और स्मारक या इंसानी स्मारक?

"अच्छा ये तो बताओ के  तुम उन्हें तुग़लक़ाबाद का क़िला क्यों बुला रही हो? वो ख़ुद को पत्थरों की दीवारों से घेरकर रखती हैं, इसलिए? "अरे नहीं! सिर्फ़ वो नहीं! तुग़लक़ाबाद के क़िले के बारे में अच्छे से सोचो।" "उसके बारे में क्या?" "बाहर से कितना सुन्दर  दिखता है वो! महरौली- बदरपुर  रोड पर से जाओ तो ऑंखें नहीं हटेंगी तुम्हारी। वो मुहार! वो हाइट!  वो सुन्दर रंग!  पर अगर तुम उससे  खिंच कर अंदर  चले गए तो उजाड़ है बिलकुल! खोखला! कुछ नहीं है अंदर।"   "वो वैसी है क्या?" "हाँ!" "अच्छा। और तुम ख़ुद कौन से मोन्यूमेंट हो?"  "हम्म्म .. पता नहीं यार! शायद बड़ा इमामबाड़ा। भूल -भुलैया समेत!"   "ये कहाँ है?"  "लखनऊ में।"  " वो तुम कैसे?" "एक दीवार के कान में चुपके से कुछ कह दो,  तो सबसे दूर के दीवार से भी वही आवाज़ गूंजती है।  हर हिस्से को पहुँच जाती है कोई भी आवाज़। कोई हिस्सा अनछुआ नहीं रह  जा ता!  और अभी तक किसी को ये समझ नहीं आया के तीन मंज़िला गुम्बद  किसी सहारे के बिना खड़ा कैसे है!!   "  "अच्छा?...