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क़िस्सा छोटे दिमाग़ का!

"अरे इतना नहीं सोचना है हमें! तुम्हें तो पता ही है न कि औरतों का दिमाग़  छोटा  होता है!" "अरे बाप रे! अब ये तुम्हें किसने कह दिया?" "मेरे चाचाजी। डॉक्टर हैं न।  उन्होंने कहा, 'देखो, लड़कर कुछ नहीं होगा।  मर्द ज़्यादा बड़ा दिमाग ले कर पैदा होते हैं। औरत का ब्रेन, मर्द से वज़न में हल्का होता है।  यह तो साइंस है।  झूठला नहीं सकती तुम! तो कोशिश क्यों करना! शांति से घर बैठो।' " "आह! और उन्होंने ये भी कहा होगा कि बस मर्द के extinct होने तक इंतज़ार करो?" "Extinct क्यों होंगे? तुम फेमिनिस्ट्स भी न!!" "अरे अरे!! इतनी जल्दी फेमिनिज्म पर मत जाओ! हम अभी साइंस पर बात कर रहे है न? तो ये बताओ Neanderthal मानव याद है तुम्हें?" "वो बहुत बड़ा सर वाला? वो तो बहुत पहले था!" "हाँ! सारे मानवों में सबसे ज़्यादा वज़न उसके ब्रेन का था।  Extinct हो गया! दुनिया से ग़ायब!!" "हाय हाय!! क्या बात कर रही हो! मर्द भी extinct हो जायेंगे?"   "हाँ! कुछ लाखों करोड़ो सालों में।  ब्रेन की वजह से नहीं।  मर्दों का जीन कमज़ोर है। मैं नही...

सुपर-दीदी

 "उस रूम में छिपकली है! अब मैं नहीं जाने वाली वहाँ! Get into action!! भगाओ उसे!" "अरे मां! ये बहुत बड़ी है।  ये मेरे हिम्मत- क्षेत्र के बहुत आगे का मामला है! मैं सिर्फ छोटी छिपकली की ज़िम्मेदारी ले सकता हूँ।  दुखिया दीदी को बुलाते हैं।"   "अरे! शाम को उसे कैसे बुलाएँगे?" "मैं बुलाऊंगा तो आ जाएगी दीदी।"  "हाँ भाई! तुम लाड़ले जो हो!" थोड़ी देर बाद -  "दीदी,  झाड़ू से  खेलो मत आप उससे!" "अरे बेटा देख तो! नीचे आ गई अब।"   "भाग जाएगी वो, दीदी। छिप जाएगी अभी। छिपकली है वो!" "अच्छा चल मार देती हूँ।"  "नहीं नहीं!! मारो मत उसे! लाश ठिकाने लगाना पड़ेगा वरना!!" "तो करना क्या है?" "बाहर निकालो।  मम्मी नहीं सोएगी वरना।"  "अच्छा चल, बाहर करके आते है।"    "आप ने उसे हाथ से उठा लिया? आप epic हो दीदी, epic!! आपका सुपरमैन ड्रेस कहाँ है?"

"आप का नमक खाया है सरदार!"

"अरे तुम्हें पता है सांभा प्रकट हुआ था !  मिल ना चाहता था !"  "अचानक? अब क्यों?"  "बोला कि आत्मग्लानि है उसे! जब सरदार उर्फ़ जोड़ीदार बुखार में पड़ा तड़प रहा था, तब सांभा ने उसका घर लूटा, निहत्ता पड़ा देखकर सब कुछ उठाकर ले गया, कुछ नहीं छोड़ा, ओढ़ने का चद्दर तक नहीं। अब उस बात के लिए शर्मसार है!"  "ओए  होए!!  श... र्म... सा... र?! भाईसाब! कवि तो है सांभा!! शब्द तो देखो! इतने समय बाद  अचानक आत्ममंथन?!" " अरे तुम भी!!  ज़िंदा मिल ने की उम्मीद नहीं की होगी  न !   किसी तरह शख्त-जान  ज़िंदा  रह   गई तो  अपनी  लूटी हुई इज्जत बटोरने की इच्छा जाग गई होगी!" "हम्म्म.....या फिर अपनी गुनाह कबूलकर स्वर्ग में बर्थ रिज़र्व करने आया होगा! सच बताओ, तुम भूरा रंग का कुछ तो नहीं पहनी थी? क्या पता  इंसान के बदले,  चर्च का कॉन्फेशन बॉक्स लगी हो 😏 ... "  "अरे गुस्सा क्यों होती हो?"  "नहीं होऊं? बेगैरत, बेहया आदमी!!" "बस! बस! समय लग जाता है - सोचो ज़रा! कुम्भ का स्नान भी तो बारह साल में आता है।  त...