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Showing posts with the label लफ़्फ़ाज़ी

"आप का नमक खाया है सरदार!"

"अरे तुम्हें पता है सांभा प्रकट हुआ था !  मिल ना चाहता था !"  "अचानक? अब क्यों?"  "बोला कि आत्मग्लानि है उसे! जब सरदार उर्फ़ जोड़ीदार बुखार में पड़ा तड़प रहा था, तब सांभा ने उसका घर लूटा, निहत्ता पड़ा देखकर सब कुछ उठाकर ले गया, कुछ नहीं छोड़ा, ओढ़ने का चद्दर तक नहीं। अब उस बात के लिए शर्मसार है!"  "ओए  होए!!  श... र्म... सा... र?! भाईसाब! कवि तो है सांभा!! शब्द तो देखो! इतने समय बाद  अचानक आत्ममंथन?!" " अरे तुम भी!!  ज़िंदा मिल ने की उम्मीद नहीं की होगी  न !   किसी तरह शख्त-जान  ज़िंदा  रह   गई तो  अपनी  लूटी हुई इज्जत बटोरने की इच्छा जाग गई होगी!" "हम्म्म.....या फिर अपनी गुनाह कबूलकर स्वर्ग में बर्थ रिज़र्व करने आया होगा! सच बताओ, तुम भूरा रंग का कुछ तो नहीं पहनी थी? क्या पता  इंसान के बदले,  चर्च का कॉन्फेशन बॉक्स लगी हो 😏 ... "  "अरे गुस्सा क्यों होती हो?"  "नहीं होऊं? बेगैरत, बेहया आदमी!!" "बस! बस! समय लग जाता है - सोचो ज़रा! कुम्भ का स्नान भी तो बारह साल में आता है।  त...

चुड़ैल की झाड़ू!

"आज सुबह सुबह ही रो ली"  "उफ़! इसलिए ऐसी आंखे है!! क्यों भाई?" "अरे मेरा जो घाव है न आते जाते दस बार छू जाता है दिन में और खून रिसता है दिन भर!"   "तो छूती क्यों हो तुम उसे?"  "भरा के नहीं देखना नहीं होगा?"  "नहीं नहीं! तुम्हे देखने की क्या ज़रुरत? बस! बैंडेज बदलवा लिया करो वो इंजेक्शन ट्रे वाले नर्स से शनिवार! छूओ मत! गुज़रो भी मत उधर से!"  "ठीक बोला! सोचती हूँ शहर ही छोड़ दूँ! इसकी गलियां छू देती है!" "कहाँ जाएगी? ए जोड़ीदार! वहाँ कौन है तेरा?"  "कोई भी मेरी राह न देखें! आँख बिछाए न कोई!!" "तो फिर?" "पर भूल न गए वो! और मुझे भी भुलाने की ज़रुरत नहीं! ये अच्छी बात है के नहीं?"  "अच्छा! ये तो बताओ दुखता कहाँ है?' "दिल में " "तो जोड़ीदार मेरे! दिल यहीं छोड़ जाना!" "अरे क्या बात करती हो! सुबह सुबह चढ़ा ली?" "तो बेकार का जाना है जानेमन! जहाँ जाओ, तेरा पीछा न ये छोड़ेगा सोणिये! भेज दे चाहे जेल में!!" "उफ़्फ़! कुछ भी रास्ता मत छोड़ो मेरे लिए! ...

बुद्ध से शून्य हो कर अनंत तक!

"ये बुद्ध जयंती को बुद्ध पूर्णिमा क्यों बोलते है ?" "जयंती भी बोलते है, पर पूर्णिमा के दिन आता है न! तो पूर्णिमा भी बोलते है।"  "पूर्णिमा बहुत ही ब्राह्मण-वादी शब्द नहीं है?" "अरे नहीं नहीं!! बौद्ध धर्म के लोग पूर्णिमा को लेकर काफ़ी एक्साइटेड रहते हैं! श्रीलंका में तो हर पूर्णिमा को छुट्टी रहती है।" "सच में?! साल में बारह छुट्टी?"   "हाँ!" "सही है! तुम गई हो श्रीलंका, है न? तभी तुम्हें इतना पता है !" "अरे नहीं! उस वजह से नहीं।  मैं ठहरी आलीम फ़ाज़िल! मुझे सब पता है!"  "नहीं नहीं! इतनी भी कुछ ख़ास नहीं हो!" "अरे हूँ यार! आत्म-ज्ञान है मुझे।"   "बड़ी आई आत्मज्ञान वाली!! दूसरे का भी दृष्टिकोण कुछ होता है आख़िर! उसका भी ज्ञान ले लो।"  "उम्म्म.... दूसरे विषयों पर दूसरों का ज्ञान ज़रूर ले सकती हूँ! दो!" "अच्छा? किस विषय पर दूँ?" "अब ये भी बात है! किस विषय पर भला!?" "तुम न! उड़ो मत ज़्यादा! गणित पर चाहिए के कंप्यूटर पर? स्टेटिस्टिक्स? या सीधा artificial intel...

जात न पूछो फेमिनिस्ट की!

"सुनो! तुम अजीब तरीके से सोते हो!  जला हुआ हाथ ढक कर सोना!" "पक्का?! हाथ  धो कर नहीं?"  "धोना क्यों है? रुई से साफ़ कर लो और बैंडेज से ढक लो!" "या ख़ुदा!! क्या करे इस औरत का! इसने तो ह्यूमर बेच कर फिश-फ्राई खा लिया लगता है! "  "याददाश्त  बेचकर पेप्सी पी* थी  और  अब ह्यूमर बेच कर फिश फ्राई?"  "अब ऐसा ही है तुम्हारा तो! जाने कब क्या कर लो!" "देखो! मैं दिलवाली हूँ।  सेल पर बेस्ट चीज़े चढाती हूँ।   याददाश्त  बेचना पड़े तो मेरी !  और ह्यूमर बेचना पड़ा तो तुम्हारा!"   "अच्छा?" "और नहीं तो? ईमान-धरम भी कोई चीज़ है! अब तुम्हारी  याददाश्त   बेचते हुए, 'ले लो! ले लो! ऐसी याददाश्त कहीं नहीं मिलेगी!   ऑफर में है!  ले लो! ' ऐसा  तो  नहीं बोल सकती न!" "ओह हो! क्या सही जा रही हो।  पर लगता है, सही  बनिया  नहीं  बन पाई तुम जात से!"  "देखिये! जात पर मत जाइये! हम रेसिस्म से सख़्त परहेज़ करते है!" "आह! जात न पूछो फेमिनिस्ट की, मत भू...

रशियन नॉवेल जैसी ज़िन्दगी!

"सुनो! आज एक  बहुत अच्छी बात हुई! शांति का एडमिशन हो गया!!" "अब ये शांति कौन है?!" "अरे रे! तुम भी यार! कुछ भी नहीं याद रहता!" "देखो! एक तो तुम अचानक नया किरदार ले धमकती हो!  और साथ में एक धमाकेदार बात भी जोड़ देती हो।" "कैसे?" "जैसे, सफी चाँद पर चला गया! अब कौन सफी? किस दिन का चाँद? चला क्यों गया?! री -एंट्री भी एक इंट्रो के साथ होता है भाई! ये नहीं के बस यूँ ही आ धमके!" "हमममम!! मैंने माना के मेरी ज़िन्दगी कुछ कुछ रशियन-नॉवेल जैसा है! कुछ ज्यादा ही किरदार है इसमें। पर तुम ये तो मानोगे के कहानी बहुत दिलचस्प है?" "उफ़्फ़!" "और अब तुम भी इसी कहानी का हिस्सा हो,  तो   आदत डाल लो! फोटो देखोगे  उसका ?" "बिना दिखाए तुम कहाँ मानोगी?" "मान तो मैं जाउंगी, पर तुम्हारे लिए ठीक नहीं है !" "ऐसा क्यों?" "बोलते है,  दृश्य से जुड़ने से यादें पक्के हो जाती है।  तुम्हारी याददाश्त  का हाल देख ही रहे हो!   फोटो बेहद ज़रूरी है!" "कुछ भी  बोलो अब त...

एवरेज-सी-हाज़िर-जवाबी!

"अर्ज़ किया है....  लबो-गुलाब के हम नहीं क़ायल*, जब तक न पुकारे नाम मेरा या कोई छाप न छोड़ जाए जिस्म पर मेरे!" "क्या बात करते हो!! नहीं नहीं! तुम्हारे लबो-गुलाब के क़ायल तो हम हर पल है!"  "सुना है एक नयी मशीन आने वाली है! लबो-गुलाब* की फोटोकॉपी करने के लिए! तुम्हारा प्रॉब्लम जल्दी ख़तम हो जायेगा!"  "अरे वाह! असली मुझे भेज देना।  फोटोकॉपी तुम रख लेना! काम चल जायेगा तुम्हारा!"  "हाहाहाहाहा!! इसी हाज़िर-जवाबी पर तो मरते है जानेमन!"  "बस?" "हाँ! और क्या?  बाकि  तो   सब एवरेज ही है तुम में!!"  "अच्छा?!"  "हाज़िर-जवाबी ही है बस!  और  शुक्र करो वो है!  वो न होता तो तुम नज़र भी नहीं आती!" " आय हाय! सच में?" " एकदम!  तुम्हारा पूरा तारुफ़* बताऊं तो, 'एवरेज-सी-हर-फन-मौला*-हाज़िर-जवाब-वाली! इनकी कोई शाखा नहीं है!!' " "हममम... और तुम बद्तमीज़  हो! कभी मैंने टैटू करवाया इसका, तो जान लेना तुम्हारा ही नाम लिखवाया है!"  "सही है! टैटू करवा ही ...

दिल, दोस्ती, और हम!

"क्यूट!"  "कौन?" "ये लड़का! जिसका फोटो भेजा तुमने।"  "अच्छा?!" "हाँ यार! कौन है ये? बताओ तो इसके बारे में!"  "अरे नहीं बता सकती! टॉप सीक्रेट है !! " "क्या यार!! मुझे भी नहीं बता सकती?" "हाँ! तुम ना फोटो डिलीट कर देना।  उसे अच्छा नहीं लगेगा कि मैंने ऐसे ही शेयर कर लिया किसी के साथ!"   "क्या बात कर रही हो? ऐसा तो बिल्कुल नहीं लगा फोटो में! यहां तो काफी ब्रॉड माइंडेड लग रहा है!  मेरी बात तो करवाओ उससे तुम!" "अरे अरे!! तुम भी न! भोले हो बहुत, इसलिए कन्फ्यूज् हो गए! ब्रॉड फोर-हेड से ब्रॉड-माइंडेड होने का कोई   ताल्लुक़  नहीं!"  "हा हा हा हा हा हा!! (वैसे देख रहा हूँ मैं सब! बस मौका मिलना चाहिए तुम्हे मेरे फोर-हेड पर तंज कसने का!)  खैर ये तो बताओ ओपन-माइंडेड है या नहीं?"  "अब उसके तो लेवल्स है न! काफी मूडी टाइप है। कभी अच्छे मूड में हुआ तो मर्दों से बातचीत में दिलचस्पी है के नहीं पूछ कर देखती हूँ।"  "मूडी है!? फिर तो रहने दो! फोटो में तो दिलचस्प लग...

कुछ इश्क़! कुछ काम!

"सोच रहा हूँ बाल और छोटे करवा लूँ!" "क्यों? अभी तो बोल रहे थे बढ़ाना है।"    "सोचा तो था, पर बढ़ेगा नहीं! समझ आ गया मुझे! तो एकदम छोटे करवा लेता हूँ। क्रू कट! क्या बोलती हो ?"  "करवा लो! घर की खेती है।"   "तू म  भी करवा लो।"   "अरे! अब मैं क्यों कराऊँ?"  "क्यूट लगोगी!" "अच्छा?!" "हाँ यार! वैसे तो कभी लगती नहीं हो।  बाल छोटे करा के देख लो! शायद बात बन जाये!" "क्या बोला!! हमममम .... . आप को ठीक दो मिनट का टाइम दिया जाता है इस वाक्य को दुबारा सोचकर बोलने के लिए ! Or this will be forever held against you in the court of ....." "अरे अरे! तुम भी न बेकार में भड़कती हो!  मैं  तो ये  बोल रहा था, इतना ज्यादा क्यूट लगना दुनिया के लिए खतरनाक हो सकता है। इसलिए बाल छोटे करवा लो। क्यूटनेस कम हो जाये थोड़ा, तो दुनिया-वाले काम भी कर लें !" "अब ठीक है! "

लजीज़ और खुश-ज़ायका!

"कल जब हम मिले तुम  बहुत ही cute लग रही थी!" "जब मिले तब? बाद में नहीं?" "हाँ यार! बस दो चार सेकंड के लिए! बाद में तो नॉर्मल हो गयी!" "वाह वाह! बड़प्पन देखो तुम्हारा! दो चार सेकंड याद भी रखा और बोल भी रहे हो!"  "वो तो  मेरा दिल है ही थोड़ा बड़ा! पर अभी मैं ऑफिस कॉल में हूँ! तुम party- return!! मुझे तंग मत करो!" "तुम ऐसे लेटे लेटे ऑफिस का कॉल कर रहे हो?" "हाँ पियक्कड़!!" "अरे बहुत शोर है यार बारापुला के रस्ते में! तुम मुझे प्रिये बोल रहे हो और  मुझे पियक्कड़ सुनाई दे रहा है!" "मैं पियक्कड़ ही बोल रहा हूँ!" "बताओ! जनाब लुढ़क रहे है! फैले हुए हैं! काम भी किसी तरह लेटे लेटे हो रहा है! और मुझ पर ये सब इल्जाम!"  "अब क्या करें! अंदर तक जकड लिया है तुमने! जड़ें और फैले, इसलिए फैला हुआ हूँ मैं! बस इसीलिए लुढ़का हुआ-सा दिखता हूँ!"  "वैसे हमने  साल भर पहले सोचा था ये जड़ों का  फैलना, रगों में दौड़ना कुछ ही समय के लिए होता है! फिर दुनिया-दारी! रस्मों-रिवाज़!"   ...

बस आ ही रहा था मैं!

"ये उस दिन लिखा था जिस दिन झगड़ा हुआ था, झरना और हौज़-ए-शम्सी को लेकर!"  Mehrauli Jharna 
 "अच्छा?! उस पर क्यों?" 
"याद नहीं?"  
"एक तो तुम झगड़ा इतना करती हो यार! याद ही नहीं रहता झगड़ा किस बात पर हुआ था!"  
 "अच्छा!? मै झगड़ा करती हूँ? वो भी इतना के वजह ही याद नहीं होता आली जनाब को?"  
"अरे! सुनो तो! मैंने कहा, झगड़ा इतना होता है कि, यह वाला किस बात पर हुआ याद नहीं!" 
"उसके पहले ये भी बोला कि तुम करती हो! मैं सब ध्यान से सुनती हूँ!" 
"एक तो तुम सुनती इतना क्यों हो और याद भी इतना कैसे रख लेती हो यह भी मुझे समझ नहीं आता !" 
"मजबूरी है! क्या करे? वरना तुम्हारा क्या भरोसा! तुम तो झरना को हौज़-ए-शम्सी कह दो और अपने सारे शुरू किए हुए झगड़े मेरे मत्थे मढ़ दो!" 
"अब देखो! तुम अलग-अलग बातों को मत मिलाओ! झरना कभी भी हौज़-ए-शम्सी नहीं हो सकता,ये तो सही है, लेकिन दूसरे वाले बात की possibility आधी तो है ही न!" 
"हम्म...... वैसे झगड़े भले ही आधे मैं शुरू करूँ, ख़त्म सारे मैं ही कर...

तुग़लक़ी चुड़ैल

'तुम्हे वो चुड़ैल के नए कारनामों के बारे में बताया?' 'कौन सी चुड़ैल? दिल्ली वाली? बंगालन? ठीक है वो?' 'हाँ यार! वही दिल्ली-वाली-बंगालन चुड़ैल !! ठीक तो कुछ ज्यादा ही रहती है, भला उसे क्या होगा! ... पर बड़े ही  तुग़लक़ी अंदाज़ है उसके!' 'तुग़लक़ी अंदाज़ ?! वाह! .... कैसे?' 'हाँ! देखो न अब.... कुछ ही  दिन पहले की बात है , मैंने कहा, "तुम आराम कर लो। इतनी दूर मुझसे मिलने आने की क्या ज़रूरत है? तुम थकी होगी। तुम्हे खामखा तकलीफ होगी " तो बस पीछे ही पड़ गयी! बोली, "तुम्हे कोई problem होगा अगर मैं तुमसे मिलने आऊँ तो?" अब तुम ही बताओ इस बात में  भला मेरी problem की बात कहाँ से आ गई ?' 'फिर?' 'मैंने कहा, "अरे नहीं! मेरी problem की नही, तुम्हारी तकलीफ की बात हो रही है!" 'अच्छा ! तो?' 'बोली, " वो तो ठीक है, पर इस पर बात हो क्यों रही है? मैने तुम्हे कहा की मुझे कोई तकलीफ  होगी?" ' 'ये तो सही पूछा । कहा था उसने के तकलीफ होगी?' 'अरे तुम भी न। आदमी की समझ-बुझ भी कोई चीज़ ह...

लॉजिक की देवी और उनके भक्त

"कल तुम कितने बजे आ रहे हो?" "सुबह के पांच बजे । " "मैं आऊं एयरपोर्ट पर ?" "नही ! पागल हो तुम! " "अच्छा!? वैसे सच बताओ एयरपोर्ट के बाहर मैं मिली तो बहुत ज्यादा हैरानी होगी तुम्हे?" "तुम ना नही आ रही हो। ओके?" "हमम! वैसे तुम्हे पता है न ऐसे मुझसे बात करना खतरे से खाली नहीं है? " "अरे यार! मत आना प्लीज!! ऐसे बोलने पर चलेगा? " "अरे ये तो बताओ बहुत हैरानी होगी अगर मैं दिख गई बाहर?" "नहीं यार! तुम्हारा क्या ! तुम तो कुछ भी कर सकती हो!!" "अब  ठीक है! बिल्कुल ठीक! मुझे तो शक़ हो रहा था इतने समय में जाना भी है ठीक से मुझे, के नहीं!! " "चलो अब तो clear हो गया न? कोई challenge नहीं कर रहा तुम्हे।  मत आना तुम प्लीज।" "क्यों? कोई और होगी तुम्हारे साथ? " "हाँ! अब सही समझी। कितना देर लगाती हो!" "अरे वाह! फिर तो ज़रूर आती हूं और रेटिंग्स भी देती हूं। दस में से सही रहेगा?" "नही नहीं!  रेटिंग नही चाहिए! कोई रेटिंग क...

मोल भाव

"एक बात पूछनी थी।  पर्सनल सा है... " "हमम!" "पूछूँ ?" "पूछ लो।  पूछने का परमिशन है।  पर जवाब की गरंटी नहीं!" "तो फिर रहने दो!" "अरे! रिस्क भी तो कोई चीज़ होता है।  नहीं पूछा तो जवाब न मिलना पक्का है! पूछो तो फिफ्टी! फिफ्टी!!" "अच्छा बढ़ाओ थोड़ा!  पचहत्तर कर लो!" "अरे नहीं नहीं! पचहत्तर  बहुत ज्यादा है! साठ कर सकती हूँ!" "कोशिश तो करो! हो जायेगा।"  "अच्छा चलो! न तुम्हारी न मेरी!  सत्तर पर फाइनल करते है! इससे बेहतर गारंटी कहीं नहीं मिलेगा! बता देती हूँ!' "उफ़्फ़ ये जान लेवा है मोल भाव तुम्हारे!!" 

हर गुलाबी , गुलाबी नही होता!

"अच्छा ये साड़ी देखो!" "हमममम....." "ओके! हमममम है। उमममम नही।" "हां यार । क्या बताऊँ , गुलाबी मुझे पसंद नही!"  "अच्छा?! और ये साड़ी का क्या? पिछले साल तो बहुत ही पसंद आई थी ये! " "ये? ये तो बहुत ही अच्छी है यार!  तुम भी कमाल करती हो! अब हर गुलाबी , गुलाबी थोड़े ही न होता है!! " "तो गुलाबी पसंद नही मतलब क्या? कैसा गुलाबी? पिंक नहीं पसंद, के मैजंटा? पॉवडर पिंक?  फ्यूशिया पसंद है? या फ्यूशिया ही वो गुलाबी है जो तुम्हे पसंद नही?" "अरे बाप रे! ये सब क्या है?" "सब गुलाबी है! " "मुआफ़ करो!! बख्श दो! गुलाबी पसंद है मुझे!"

नाम में क्या रखा है!

"इन का नाम क्या बताया? ज़रा फिर से बताइये!" "अरे नाम में क्या रखा है!" "सो तो है, पर बहुत खूबसूरत है!" "अच्छा?! नाम? के ये?" "उमममम ..... दोनों !"