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बिना विश्वास के आदमी! जैसे पानी में बहती लकड़ी!

  "तुम सुबह ब्रश करने में विश्वास रखती हो?" "बहुत! जिसे कहते हैं गहरा विश्वास!" "अरे वाह!"  "हाँ यार! कुछ न कुछ में तो विश्वास रखना ज़रूरी है न!" "बिलकुल।  बिना विश्वास के आदमी पानी में बहती लकड़ी की तरह हो जाता है यार!"  "सही कहा!" "पानी से याद आया, तुम सर्दियों में नहाने में यक़ीन रखती हो?"  "अरे अरे! क्या बात करती हो! अब विश्वास के भंवर में इतना भी मत बहो।अपना दिमाग़ भी कुछ होता है कि नहीं! हर बात पर यक़ीन थोड़े ही कर सकते है?" "वो भी सही है!"