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इंसान और स्मारक या इंसानी स्मारक?

"अच्छा ये तो बताओ के  तुम उन्हें तुग़लक़ाबाद का क़िला क्यों बुला रही हो? वो ख़ुद को पत्थरों की दीवारों से घेरकर रखती हैं, इसलिए? "अरे नहीं! सिर्फ़ वो नहीं! तुग़लक़ाबाद के क़िले के बारे में अच्छे से सोचो।" "उसके बारे में क्या?" "बाहर से कितना सुन्दर  दिखता है वो! महरौली- बदरपुर  रोड पर से जाओ तो ऑंखें नहीं हटेंगी तुम्हारी। वो मुहार! वो हाइट!  वो सुन्दर रंग!  पर अगर तुम उससे  खिंच कर अंदर  चले गए तो उजाड़ है बिलकुल! खोखला! कुछ नहीं है अंदर।"   "वो वैसी है क्या?" "हाँ!" "अच्छा। और तुम ख़ुद कौन से मोन्यूमेंट हो?"  "हम्म्म .. पता नहीं यार! शायद बड़ा इमामबाड़ा। भूल -भुलैया समेत!"   "ये कहाँ है?"  "लखनऊ में।"  " वो तुम कैसे?" "एक दीवार के कान में चुपके से कुछ कह दो,  तो सबसे दूर के दीवार से भी वही आवाज़ गूंजती है।  हर हिस्से को पहुँच जाती है कोई भी आवाज़। कोई हिस्सा अनछुआ नहीं रह  जा ता!  और अभी तक किसी को ये समझ नहीं आया के तीन मंज़िला गुम्बद  किसी सहारे के बिना खड़ा कैसे है!!   "  "अच्छा?...

बस आ ही रहा था मैं!

"ये उस दिन लिखा था जिस दिन झगड़ा हुआ था, झरना और हौज़-ए-शम्सी को लेकर!"  Mehrauli Jharna 
 "अच्छा?! उस पर क्यों?" 
"याद नहीं?"  
"एक तो तुम झगड़ा इतना करती हो यार! याद ही नहीं रहता झगड़ा किस बात पर हुआ था!"  
 "अच्छा!? मै झगड़ा करती हूँ? वो भी इतना के वजह ही याद नहीं होता आली जनाब को?"  
"अरे! सुनो तो! मैंने कहा, झगड़ा इतना होता है कि, यह वाला किस बात पर हुआ याद नहीं!" 
"उसके पहले ये भी बोला कि तुम करती हो! मैं सब ध्यान से सुनती हूँ!" 
"एक तो तुम सुनती इतना क्यों हो और याद भी इतना कैसे रख लेती हो यह भी मुझे समझ नहीं आता !" 
"मजबूरी है! क्या करे? वरना तुम्हारा क्या भरोसा! तुम तो झरना को हौज़-ए-शम्सी कह दो और अपने सारे शुरू किए हुए झगड़े मेरे मत्थे मढ़ दो!" 
"अब देखो! तुम अलग-अलग बातों को मत मिलाओ! झरना कभी भी हौज़-ए-शम्सी नहीं हो सकता,ये तो सही है, लेकिन दूसरे वाले बात की possibility आधी तो है ही न!" 
"हम्म...... वैसे झगड़े भले ही आधे मैं शुरू करूँ, ख़त्म सारे मैं ही कर...

अपनी-अपनी श्रद्धा है

"हम बेकार मे टिकट तो नही ले रहे? 5 ही बजे तक खुला रहता हो तो?" "अरे! मैं बोल रही हूँ ना, सन-सेट तक का टाइम है! चलो टिकट लेते हैं।" टिकट के लाइन में पीछे से, "भाईसा'ब! ये सुंदर नर्सरी कब तक खुला रहेगा?" पूरे शिद्दत के साथ पीछे घूमकर:  "देखिए भाईसाब! मुझे तो पता नहीं पर ये बोल रहीं हैं के अभी काफी टाइम है। और मैं इन पर भरोसा कर रहा हूँ। आप अपनी देख लो। आख़िर में सब अपनी-अपनी श्रद्धा है!"

मर जाओ तुम!

" ये जगह याद है ?" "कुछ ख़ास है?" "हाँ! यहां तुमने मुझे पिछले साल मर जानेको कहा था!" "सच? अरे नहीं ! मैं तुम्हे मर जानेको कैसे बोल सकता हूँ?"  "'मर जाओ तुम! बस मर जाओ!' ऐसे बोला था!" "क्यों?" "वो तुमने पूछा था मैंने शेक्सपियर पढ़ा है के नहीं? तो मैंने ना बोला!" "अब पढ़ा? साल बीत गया" "नहीं यार!" "मर जाओ तुम! बस मर जाओ!"