"ये उस दिन लिखा था जिस दिन झगड़ा हुआ था, झरना और हौज़-ए-शम्सी को लेकर!"  Mehrauli Jharna
"अच्छा?! उस पर क्यों?"
"याद नहीं?"
"एक तो तुम झगड़ा इतना करती हो यार! याद ही नहीं रहता झगड़ा किस बात पर हुआ था!"
"अच्छा!? मै झगड़ा करती हूँ? वो भी इतना के वजह ही याद नहीं होता आली जनाब को?"
"अरे! सुनो तो! मैंने कहा, झगड़ा इतना होता है कि, यह वाला किस बात पर हुआ याद नहीं!"
"उसके पहले ये भी बोला कि तुम करती हो! मैं सब ध्यान से सुनती हूँ!"
"एक तो तुम सुनती इतना क्यों हो और याद भी इतना कैसे रख लेती हो यह भी मुझे समझ नहीं आता !"
"मजबूरी है! क्या करे? वरना तुम्हारा क्या भरोसा! तुम तो झरना को हौज़-ए-शम्सी कह दो और अपने सारे शुरू किए हुए झगड़े मेरे मत्थे मढ़ दो!"
"अब देखो! तुम अलग-अलग बातों को मत मिलाओ! झरना कभी भी हौज़-ए-शम्सी नहीं हो सकता,ये तो सही है, लेकिन दूसरे वाले बात की possibility आधी तो है ही न!"
"हम्म...... वैसे झगड़े भले ही आधे मैं शुरू करूँ, ख़त्म सारे मैं ही कर...
Dastan e Guftagu is dedicated to everyday humour in conversations that make you smile, laugh, enjoy life a bit more. Quips in conversation and wit have always attracted me. So much so that I remember these conversations and started noting them last year. I created this blog to share the fun.