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दुआओं का हिसाब किताब

"मुझे सौ रुपया दे देना! " "क्यों भला?"  "आज दरगाह में धागा बाँधा था। तुम्हारे लिए! " "अच्छा!! मेरे लिये बाँधा?" "हाँ यार! उतने ही पैसे थे। फिर भी!"  "वाह! क्या मांगा?" "ऐसा हो के मैं  हमेशा  तुम्हे ओढ़ू, तुम्हे बिछाऊं,  तुम पर छप जाऊं, तुम में खोऊं और तुम  ही में पायी जाऊं। हमेशा!!" "बढ़िया! वैसे ये दुआ मेरे लिए कैसे  था?" "और नहीं तो? ऐसा नही हुआ तो सोचो तुम्हारा क्या होगा!  दिल कितना बड़ा है मेरा!" "सच मे! ये तो सोचा ही नहीं!  मानना पड़ेगा!! बहुत ही बड़ा दिल है  तुम्हारा ! " "फिर नहीं तो?!  बस  पैसे दे देना तुम। " "ज़रूर!! सूद समेत! "