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Showing posts with the label कहावत

तू कौन मैं खामखा!

  "जल्दी से गाड़ी में बैठो! रस्ते में खड़े क्यों हो?" "अरे मैं अमरूद भूल गया।"   "अब रहने दो! वापस तो जा नहीं सकते!" "अरे नहीं! ये तो बहुत ही बुरा है ।  मुझे अमरूद खाना था।" "उफ्फ! बच्चे मत बनो।  कोई मर नहीं रहा बिना अमरूद के।"   "तुम्हें क्या पता? कोई मर जाये तो?"   "अरे छोडो भी अब।" "कैसे छोड़ूँ? अरे अरे!! वो देखो फल का ठेला वहां है।  भैय्या, गाड़ी रोकिये!  मुझे अमरूद लेना है।" "नहीं! नहीं! बिलकुल गाड़ी मत रोकिये, भैय्या! मुझे जल्दी पहुंचना है।  मीटिंग है। हम घर पहुँच जाये तो फिर तुम निकल जाना आम, अमरूद कुछ भी लेने। " "हे राम! ये औरत तो मुझे अमरुद भी नहीं दिला रही है! कितनी ज़ालिम है! भैय्या, अब आप रोक दीजिये बस गाड़ी!"  "अब क्यों? ठेला वाला तो गया।" "अब मैं जमीन में लेट जायूँगा, पैर पटकूंगा, और अपने ऊपर मिट्टी डाल लूंगा!! सब को बताऊंगा ये तो मुझे अमरुद भी नहीं दिलाती है!" "हममम ... रोक ही दीजिये भैय्या गाड़ी फिर! लेकिन १ मिनट के लिए। इसे उतारकर तुरंत भाग जायेंगे - फिर...

दुनिया की सबसे पुरानी कहानी, दूध का दूध और पानी का पानी!

 "क्या हुआ?" "अरे वही! दुनिया की सबसे पुरानी कहानी, दूध का दूध और पानी का पानी!"  "अरे कमाल! पर ये हुआ कैसे?"  "बड़बोले भाईसा'ब कल निकल लिए चोरों की तरह।" "क्या बात करती हो! बड़ा दूध का धुला लगता था वो तो, कम से कम उसकी अपनी बातों से।"   "हाहाहाहा! एक गड़बड़ हम में क्या है जानते हो? वो जो एक तो करेला उपर से नीम चढ़ा होते है न - पता नहीं हम क्यों उन्हें सच्चा भी मान लेते है!"  "अरे अपना ढोल  कोई  खूब पीटे तो आवाज़ तो फिर भी होती ही है न? जानते तो हम है के अधजल गगरी छलकत जाए, पर भूल जाते है!!  इनकी सुनो तो इनसे बड़े सच्चे, क्रांतिकारी, मानविकता से भरपूर लोग है ही नहीं! पर बस देखते रह जाओगे के पहला मौका लगते ही चोरी पर उतर आते है! पता नहीं तब सच्चाई कहाँ जाती है!"  "आह! अब से ऐसे मियाँ मिट्ठू की आवाज़ आते ही सोच लेना पड़ेगा की दाल में कुछ काला है!" "और बता भी देना के यहाँ उनकी दाल नहीं गलेगी!" "ठीक!" "और हाँ! इन थाली के बैगनों को कोने में सरकाकर ही रखो! और शक्ल दिखाने आए तो बोल दो, "मि...

एक पंथ दो काज!

 "अच्छा सुनो! एक हार दिखाना था..." "दिखाओ" "ये लो!"  "ये तो साड़ी है!"  "अरे हार भी है देखो तो!" "ओह ये हार है? ऐसा तो पायल होता है!" "इतना चौड़ा? साफ़ दिख रहा है हार है! " "अरे दो  पायल  रख दो एक साथ! हो गया बस।"   "कुछ भी बोल दो बस! अच्छा है के नहीं बताओ।"   "अच्छा तो है।  कितने का है?" "अब कीमत तो देखो कुछ  ज़्यादा ही है! !"  "अरे राम राम! मत खरीदो! मेरे मम्मी के पास बिलकुल ऐसे वाले है.... पायल।"   "तुम्हारे मम्मी के पास है तो मैं क्या करूँ? चोरी करके लाओगे मेरे लिए?" "हाँ लाता हूँ! अगली बार। पक्का!"  "कब जाओगे फिर घर?" "जल्दी है तुम्हे?" "हाँ एक पंथ दो काज! मुझे हार मिल जायेगा और तुम जेल चले जाओगे। तो ये बकवास भी नहीं सुनना पड़ेगा।  आजकल कोविड का टाइम है, मिलने नहीं देते!" "अरे ऐसे नहीं बच सकती तुम! ई-मुलाकात जारी है!" "हे राम!!"

कितने धान से कितना चावल बनता है आख़िर ?

"तूम आसपास आते ही मिस्ड कॉल दे देना।"  "क्यों?"  "मैं नीचे आ जाऊंगी!"  "फूल माला लेकर?"  "हाँ हाँ! क्यों नहीं ? सिंदूर भी साथ लाऊं ? टीका करने?" "ज़रूर!" "और साथ में  चावल लाऊँ के  धान? गीले सिंदूर के ऊपर लगाऊँ? के थाली में रखना है? कुछ एक तो करना होता है ना?"  "धान ही  ले आओ! चावल बाद में बन जाएंगे।"   "हाँ यार!  सही है!  लगे हाथ कितने धान से कितना चावल बनता है, पता भी चल जाएगा*!"   *बांग्ला में एक कहावत है "कतो धाने कतो चाल होय!" जिससे ये समझाया जाता है के आप काम शुरू करो तो कठिनाई पता चलती जाती है।