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फिर न कहिए कि मुद्दआ कहिए!

"पर बताओ, मैं इतनी ख़राब हूँ क्या? छुपाकर रखने लायक?" "हम्मम!" "अरे मैंने भी क्या पूछ लिया! जाने दो! जवाब मत दो!" "हाँ!" "हाँ, क्या?" " दे दिया! सवाल का जवाब!" "आय हाय! इतनी ख़राब हूँ मैं? तुमने उनसे agree किया? ठीक है! कोई बात नहीं! कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए ...ज़ालिम दुनिया! " "अब देखो ख़ुद को! ज़िक्र मेरा, उम्म्म मेरा मतलब है, ज़िक्र सच का सुना तो चिढ़ के कहा, किस दिवाने की बात सुनते हो!!" "अरे रहने दो अब! दाग़ से जावेद क़ुरेशी तक मत भटको! सदियों भटक जाओगे!! वो भी ग़लत सलत! वो कहते है न, आप अब मेरा मुँह न खुलवाएँ, ये न कहिए कि मुद्दआ कहिए  -  अब तो बोल ही दिया तुमने..." "जान क्यों जलाती हो? तुझ को अच्छा (भी) कहा है (जाने) किस किस ने, कहने वालों को और क्या कहिए!" "ओय होय!! शुक्र है!! वापस तो आए दामन ए दाग़ में... ताना ही सही! आ गई आप को मसीहाई , मरने वालों को मरहबा कहिए ... "   "तुम मरने वाली हो?" "नहीं! नहीं! मैं नहीं! दाग़! उन्होंने कहा ये!" "अरे अरे! उम्मीद स...