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Showing posts from November, 2020

निकम्मा फेसबुक!

"अरे तुम्हें  पता है माँ काफी गुस्से में थी आज!"  "क्यों?" "बोली ,कि मैं दिखती नहीं हूँ फेसबुक पर उन्हें। उनसे छुपाकर काम करती रहती हूँ अपना।"   "तो तुमने क्या बोला?" "मन तो हुआ पूछूं कि 'देखना क्या है?' फिर भी समझाने की कोशिश की, कि मेरे पोस्ट्स देखने के लिए उन्हें लाइक करते रहना होगा।" "तो?" "बस गुस्सा हो गईं! बोलीं, 'पसंद न आये तब भी? काम तुम्हारे पसंद करने लायक होते तो है नहीं! लाइक किस बात का दूँ?'" "अब कौन उनको एलगोरिदम  समझाए!" "वही तो! उनकी शिकायत  ये है कि फेसबुक हमारे छोटे शहर के पडोसी की तरह क्यों नहीं बन जाता?" "कैसे?" "तुम चाहे कितना भी अनदेखा करो अपनी लड़की को, वो आ कर बताकर जाएंगे, 'आज देखा आपकी लड़की को वहां पुराना किला के पीछे सेल्फ़ी खींच रही थी किसी अधेड़ उम्र के आदमी के साथ! और फिर तो कुछ हद्द ही हो गई! मैंने देखा कि  कोई छोटे से लड़के के साथ  गले में हाथ डाले घूम रही है सुन्दर नर्सरी में। कितना हस हस कर बातें कर रहे थे दोनों - क्या बताऊँ मैं आपको!...

मेरा favourite pastime!

 "तुम्हारे बाल झर रहे है! लटक रहे है कंधे के पास देखो !"  "कहाँ है? हाथ में नहीं आ  रहा!" "अब देखोगे तब न! रुको मैं निकालती हूँ!" "अरे तुम कैसे निकालोगी?" "हाथ से, और कैसे?  ये लो! अब ये गया कचरे के डिब्बे में" "कहाँ?! मुझे तो दिखा नहीं! सच में था क्या?' "नहीं! मैं झूठ बोल रही थी! झरे हुए बालों के बारे में झूठ बोलना तो  मेरा favourite pastime है   !"  "अरे झूठी थोड़े ही बोलै मैंने? अब देखो गलती भी हो सकती है! सोचा था है, पर है नहीं!' "नहीं नहीं!! मुझे benefit of doubt देने की बिलकुल ज़रुरत नहीं! झूठ ही बोला होगा मैंने!" "अरे हाँ! मुझे इस वहम में कतई नहीं रहना चाहिए के तुम से  ग़लती से हो गया  ये,   हो  तो  तुम चुड़ैल  की जात  ही आख़िर! तुम्हारा क्या भरोसा? बालों से जाने क्या क्या कर दो!" "हाँ! हाँ! क्यों नहीं? देखो जा कर आईने में! कहीं नीली चमड़ी वाले सियार तो नहीं बन गए? जाने कब से  हुआ-हुआ किए जा रहे हो!"

मर्द तो मर्द का दोस्त होता है न?

"दीदी, एक बात बोलनी थी... "  "बोलो"  "हममम ...... " "अरे बोलो तो। उदास चेहरा बनाकर डराओ मत।"  "दीदी, वो एक लड़की रहती थी न मेरे पास, नीता, जिसकी शादी कराई थी मैंने, अब बोल रहे हैं चली गई वो घर छोड़कर, बच्चों को ले कर, परसो। बोल रहे हैं-कहीं नहीं मिल रही।"    "मतलब क्या? ख़ुद चली गई या बच्चों समेत उठाई ली गई?"  "नहीं। ख़ुद गई।  एक कपडे में.... कुछ ले कर भी नहीं गई।  देखा बोलती है पड़ोसन ने किसी के साथ, पर वो अब मुंह नहीं खोल रही है।" "अच्छा! फिर तो सब ठीक है! उसे किसी से प्यार हुआ होगा, खुद अपने मन से गई और बच्चों को ले कर गई।  ठीक होगी फिर तो। तुम क्यों परेशान हो?" "अरे दीदी! शादी मैंने करवाई थी न! अब फ़ोन करके बोल रहे हैं, 'आपने अच्छी लड़की बोला तो हमने शादी कर ली, अब भाग गई!'" "छह साल पहले बोला था न! अब क्या है? छह साल में दुनिया कहाँ से कहाँ चली जाती है।" "सो तो है दीदी! पर ये लड़की भी कैसी है! सुना है मारता भी नहीं था पति उसका।  बताओ! फिर भी चली गई!!"  "हाँ ये तो गलत ब...

दुनिया की सबसे पुरानी कहानी, दूध का दूध और पानी का पानी!

 "क्या हुआ?" "अरे वही! दुनिया की सबसे पुरानी कहानी, दूध का दूध और पानी का पानी!"  "अरे कमाल! पर ये हुआ कैसे?"  "बड़बोले भाईसा'ब कल निकल लिए चोरों की तरह।" "क्या बात करती हो! बड़ा दूध का धुला लगता था वो तो, कम से कम उसकी अपनी बातों से।"   "हाहाहाहा! एक गड़बड़ हम में क्या है जानते हो? वो जो एक तो करेला उपर से नीम चढ़ा होते है न - पता नहीं हम क्यों उन्हें सच्चा भी मान लेते है!"  "अरे अपना ढोल  कोई  खूब पीटे तो आवाज़ तो फिर भी होती ही है न? जानते तो हम है के अधजल गगरी छलकत जाए, पर भूल जाते है!!  इनकी सुनो तो इनसे बड़े सच्चे, क्रांतिकारी, मानविकता से भरपूर लोग है ही नहीं! पर बस देखते रह जाओगे के पहला मौका लगते ही चोरी पर उतर आते है! पता नहीं तब सच्चाई कहाँ जाती है!"  "आह! अब से ऐसे मियाँ मिट्ठू की आवाज़ आते ही सोच लेना पड़ेगा की दाल में कुछ काला है!" "और बता भी देना के यहाँ उनकी दाल नहीं गलेगी!" "ठीक!" "और हाँ! इन थाली के बैगनों को कोने में सरकाकर ही रखो! और शक्ल दिखाने आए तो बोल दो, "मि...

फिर न कहिए कि मुद्दआ कहिए!

"पर बताओ, मैं इतनी ख़राब हूँ क्या? छुपाकर रखने लायक?" "हम्मम!" "अरे मैंने भी क्या पूछ लिया! जाने दो! जवाब मत दो!" "हाँ!" "हाँ, क्या?" " दे दिया! सवाल का जवाब!" "आय हाय! इतनी ख़राब हूँ मैं? तुमने उनसे agree किया? ठीक है! कोई बात नहीं! कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए ...ज़ालिम दुनिया! " "अब देखो ख़ुद को! ज़िक्र मेरा, उम्म्म मेरा मतलब है, ज़िक्र सच का सुना तो चिढ़ के कहा, किस दिवाने की बात सुनते हो!!" "अरे रहने दो अब! दाग़ से जावेद क़ुरेशी तक मत भटको! सदियों भटक जाओगे!! वो भी ग़लत सलत! वो कहते है न, आप अब मेरा मुँह न खुलवाएँ, ये न कहिए कि मुद्दआ कहिए  -  अब तो बोल ही दिया तुमने..." "जान क्यों जलाती हो? तुझ को अच्छा (भी) कहा है (जाने) किस किस ने, कहने वालों को और क्या कहिए!" "ओय होय!! शुक्र है!! वापस तो आए दामन ए दाग़ में... ताना ही सही! आ गई आप को मसीहाई , मरने वालों को मरहबा कहिए ... "   "तुम मरने वाली हो?" "नहीं! नहीं! मैं नहीं! दाग़! उन्होंने कहा ये!" "अरे अरे! उम्मीद स...