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Showing posts from December, 2020

भूलने और ऑलमोस्ट भूलने में फ़र्क!

  "हैलो एकता!" "एकता?! मैं एकता टावर में रहती हूँ ज़रूर पर नाम मेरा एकता नहीं है!" "ओह हो! सॉरी सॉरी!! भूल ही गयी थी ऑलमोस्ट! तुम्हारे नाम के साथ अपार्टमेंट का नाम लिख कर रखा था, गलती से वो ही निकल गया!" "अच्छा! बताइए ... कुछ काम था? " "मुझे एक २४ घंटे की कामवाली चाहिए।  दिला दो न! वही जो रात में भी रहती है - " "मैं कहाँ से दिलवा दूँ .... " "ओह हो! रुको एक मिनट।  भूल ही गयी थी ऑलमोस्ट! Let me ask you  तुम्हारी कैसी कट रही है इस कोरोना के समय में।  वैसे तुम बंगाली 'कोरोना, कोरोना' तो वैसे भी करते रहते हो।   देखा था व्हाट्सप्प में मैंने --   तुम्हारे लिए तो ये कुछ भी नहीं - हाहाहा!! " "जी मैं ठीक हूँ।  पर अभी ऑफिस के काम में व्यस्त हूँ।  तो अभी बहुत बात नहीं कर सकती और न ही किसी २४ घंटे की कामवाली का पता है मुझे..... " "अरे रे! मुसीबत हो गई।  मुझे लगा तुम्हे ज़रूर मालूम होगा! गरीबों के साथ इतना काम की बात करती हो तुम!"  "कौन? एकता?"  "मज़ाक क्यों करती हो? बोला न  ऑलमोस्ट  भूल गयी...

बिना विश्वास के आदमी! जैसे पानी में बहती लकड़ी!

  "तुम सुबह ब्रश करने में विश्वास रखती हो?" "बहुत! जिसे कहते हैं गहरा विश्वास!" "अरे वाह!"  "हाँ यार! कुछ न कुछ में तो विश्वास रखना ज़रूरी है न!" "बिलकुल।  बिना विश्वास के आदमी पानी में बहती लकड़ी की तरह हो जाता है यार!"  "सही कहा!" "पानी से याद आया, तुम सर्दियों में नहाने में यक़ीन रखती हो?"  "अरे अरे! क्या बात करती हो! अब विश्वास के भंवर में इतना भी मत बहो।अपना दिमाग़ भी कुछ होता है कि नहीं! हर बात पर यक़ीन थोड़े ही कर सकते है?" "वो भी सही है!"