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Showing posts from May, 2020

थोड़ा सा रूमानी हो जाए!

"अभी वीडियो कॉल नहीं कर सकती! ईयरप्लग लाना भूल गई और उबर में हूँ!" "उबर कब से हो गया! तुम्हारा तो इउ-बर था न?" "बस एक गलती होने की देर और चिपट जाओ तुम!"  "अच्छा नहीं चिपटता! कैमरा ऑन करो तुम !"  "क्यों? ज़ोर ज़ोर से सुनाई देगा! टैक्सी में हूँ!" "सुनाई देने दो!  मदद चाहिए मुझे। " "अच्छा ये लो!"  "अब बताओ इतना जीरा पॉवडर ठीक है ? अंडा करी बना लेता हूँ आज।  क्या बोलती हो?" "सही है! पर जीरा कितना है?" "जितना दिख रहा है उतना ही!" "अरे ऐसे थोड़े ही समझ आता है? चम्मच से बताओ।  कितना चम्मच लिया था?" "रुको! नाप कर देखता हूँ! " "धनिया लिया?" "हाँ! धनिया बताओ! आमचूर भी है!" "टमाटर डालोगे न? फिर आमचूर क्यों?" "चटपटा बनेगा!"  "अरे नहीं! ज्यादा हो जायेगा! या तो टमाटर डालो या आमचूर! अचारी बिरियानी बनानी है क्या?" "उफ़्फ़ क्या याद दिला दिया! चलो आमचूर कैंसिल! प्यांज़ देखो कितना बढ़िया कटा है!" "वाकई बढिया है! अब चालू हो जाओ!...

बुद्ध से शून्य हो कर अनंत तक!

"ये बुद्ध जयंती को बुद्ध पूर्णिमा क्यों बोलते है ?" "जयंती भी बोलते है, पर पूर्णिमा के दिन आता है न! तो पूर्णिमा भी बोलते है।"  "पूर्णिमा बहुत ही ब्राह्मण-वादी शब्द नहीं है?" "अरे नहीं नहीं!! बौद्ध धर्म के लोग पूर्णिमा को लेकर काफ़ी एक्साइटेड रहते हैं! श्रीलंका में तो हर पूर्णिमा को छुट्टी रहती है।" "सच में?! साल में बारह छुट्टी?"   "हाँ!" "सही है! तुम गई हो श्रीलंका, है न? तभी तुम्हें इतना पता है !" "अरे नहीं! उस वजह से नहीं।  मैं ठहरी आलीम फ़ाज़िल! मुझे सब पता है!"  "नहीं नहीं! इतनी भी कुछ ख़ास नहीं हो!" "अरे हूँ यार! आत्म-ज्ञान है मुझे।"   "बड़ी आई आत्मज्ञान वाली!! दूसरे का भी दृष्टिकोण कुछ होता है आख़िर! उसका भी ज्ञान ले लो।"  "उम्म्म.... दूसरे विषयों पर दूसरों का ज्ञान ज़रूर ले सकती हूँ! दो!" "अच्छा? किस विषय पर दूँ?" "अब ये भी बात है! किस विषय पर भला!?" "तुम न! उड़ो मत ज़्यादा! गणित पर चाहिए के कंप्यूटर पर? स्टेटिस्टिक्स? या सीधा artificial intel...

जात न पूछो फेमिनिस्ट की!

"सुनो! तुम अजीब तरीके से सोते हो!  जला हुआ हाथ ढक कर सोना!" "पक्का?! हाथ  धो कर नहीं?"  "धोना क्यों है? रुई से साफ़ कर लो और बैंडेज से ढक लो!" "या ख़ुदा!! क्या करे इस औरत का! इसने तो ह्यूमर बेच कर फिश-फ्राई खा लिया लगता है! "  "याददाश्त  बेचकर पेप्सी पी* थी  और  अब ह्यूमर बेच कर फिश फ्राई?"  "अब ऐसा ही है तुम्हारा तो! जाने कब क्या कर लो!" "देखो! मैं दिलवाली हूँ।  सेल पर बेस्ट चीज़े चढाती हूँ।   याददाश्त  बेचना पड़े तो मेरी !  और ह्यूमर बेचना पड़ा तो तुम्हारा!"   "अच्छा?" "और नहीं तो? ईमान-धरम भी कोई चीज़ है! अब तुम्हारी  याददाश्त   बेचते हुए, 'ले लो! ले लो! ऐसी याददाश्त कहीं नहीं मिलेगी!   ऑफर में है!  ले लो! ' ऐसा  तो  नहीं बोल सकती न!" "ओह हो! क्या सही जा रही हो।  पर लगता है, सही  बनिया  नहीं  बन पाई तुम जात से!"  "देखिये! जात पर मत जाइये! हम रेसिस्म से सख़्त परहेज़ करते है!" "आह! जात न पूछो फेमिनिस्ट की, मत भू...