"एक सुस्त सा खयाल आया है!"
"सुनाओ"
"सुस्त उँगलियों से कुछ सुस्त सी नज़्म लिख दूँ तुम्हारे जिस्म पर!"
"अब तक लिखा है तुमने नज़्म कोई?"
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"लिखूंगा! पहले पढ़ तो लूँ....जिस दिन हरफ़ दर हरफ़ पढ़ लूंगा तुम्हे, हर हरफ़ को छू कर जैसे मेज़ पर रखा ब्रेल में बना नक़्शा हो कोई इस शहर का! उस दिन लिख लूंगा कोई जादुई नज़्म!"
"और तब तक?"
"तब तक कोशिशें जारी-ओ-सारी रहेंगी!"

वैसे एक समय पर मुझे सारी नज़्म सुस्त लगती थी। जब कुछ समझ नही आता था। और शायद सुनाने या गाना वाला सुस्त बना देता है नज़्म। लिखने वाला नही। तो लिखने में सुस्त कैसा??
ReplyDeleteजब तुम सोच सोच कर धीरे धीरे लिखो। घीस घीस कर चले उँगलियाँ। सुस्त नज़्म हुआ के नहीं?
Deleteहाहाहाहा तब तो नज़्म क्या सोच भी सुस्त हो गयी।
Deleteआदमी भी! ;)
Deleteउमदा
Deleteनज़्म भी सुस्त हो चुका है ठंड से😊
Shayad! Aag seNk kar dekhti hu 😊😊
Delete"सुस्त उँगलियों से कुछ सुस्त सा नज़्म लिख दूँ तुम्हारे जिस्म पर!". Oh!
ReplyDeleteAah!
DeleteWaise kuch bhi achcha likhna sust lamho me hi hota hai aksar... Bhagte daudte lamho me kuch bhi achcha likhna..mushkil hai bohot mushkil.
ReplyDeleteअब ये बात भी सही है!
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