Skip to main content

कितने धान से कितना चावल बनता है आख़िर ?

"तूम आसपास आते ही मिस्ड कॉल दे देना।" 

"क्यों?" 

"मैं नीचे आ जाऊंगी!" 

"फूल माला लेकर?" 

"हाँ हाँ! क्यों नहीं ? सिंदूर भी साथ लाऊं ? टीका करने?"

"ज़रूर!"

"और साथ में चावल लाऊँ के  धान? गीले सिंदूर के ऊपर लगाऊँ? के थाली में रखना है? कुछ एक तो करना होता है ना?" 

"धान ही ले आओ! चावल बाद में बन जाएंगे।"  

"हाँ यार! सही है! लगे हाथ कितने धान से कितना चावल बनता है, पता भी चल जाएगा*!"  


*बांग्ला में एक कहावत है "कतो धाने कतो चाल होय!" जिससे ये समझाया जाता है के आप काम शुरू करो तो कठिनाई पता चलती जाती है।  


Comments

  1. पता लगा। धान कूटते-कूटते चावल के बजाय आटा बन गया।।

    ReplyDelete
    Replies
    1. Phir toh pitha banega. Beema se poochho. Aur dhan se chawal wala kahawat bhi poochho 😀

      Delete
    2. हाँ। मतलब काम करके तो देखो तब पता चलेगा। खाली बात करने से क्या होगा।

      Delete
    3. Sahi! Aisa kahawat hindi me kya hai?

      Delete
  2. Kahawat to hai...Par yaad nahi aa rha...

    ReplyDelete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ये दिल्ली वाले!

"आज मै तुम्हारे घर आते आते रह गया!" "मेरे घर आ रहे थे? क्यों? हमारी बात तो नहीं हुई थी!"  "अरे सुनो तो! मैंने ऑफिस से जब उबर बुक किया तो  मेरे घर के बदले तुम्हारा घर  का  पता  लिया अपने आप!" "मेरे घर का? ये कैसे? भूख लगी थी क्या तुम्हे?"  "पता नही! फिर लाजपत नगर फ्लाईओवर देख कर समझ आया ये तो कहीं और जा रहा है.. " "ओह हो!"  "हाँ! फिर मैंने जल्दी से एड्रेस चेंज किया! पिछले दिन तुमने जो कच्चे आलू खिलाये थे, वो याद आ गए! ऑटो को बोला, टर्न अराउंड!" "बहुत सही किया! बहुत ही सही!! वरना आलू आज तुम्हारे माथे पर बनते! साल में चालिस दिन खाना खाते हो इधर, एक दिन का कच्चा आलू याद है! उनतालीस दिन का उम्दा पकवान नही! बहुत सही किया ऑटो मोड़ लिया। इधर आना भी मत तुम!"

चोर का इमोशन होता है, पर चुड़ैल का?

"अब मान भी लो!"  "क्या?"  "ये काम तुम्हारा ही है न?" "कौन सा?" "ये फ़ोन गायब होना?" "अरे! मै दूसरे शहर में हूँ! मेरा काम कैसे होगा?"  "सच बताओ!" "नहीं भाई! मानती हूँ के मुझे ही फ़ोन न करो तो फ़ोन की तुम्हे ज़रुरत क्या है, ऐसा लगा था मुझे......"  "वही तो!  अब छुपाओ मत! राज़ खुल गया! ये सब वही है।  तंतर मंतर जादू टोना! अब तो साबित  ही हो गया के तुम ही वो बंगाली चुड़ैल हो जिससे हम बिचारे हिंदी प्रदेश के लोग सदियों से डरते आये है!"  "सदियों से?" "हाँ! हाँ! सदियों से!"  "अच्छा! और ये नहीं सीखाया गया हिंदी प्रदेश के लोगों को के अंधे को अंधा, बहरे को बहरा , चुड़ैल को चुड़ैल नहीं बोलते?"  "नाह! हमे सिर्फ सिखाया गया है के चोर को चोर नहीं, चौकीदार बोलते है! चोर का भी इमोशन होता है आखिर!!" 

तू कौन मैं खामखा!

  "जल्दी से गाड़ी में बैठो! रस्ते में खड़े क्यों हो?" "अरे मैं अमरूद भूल गया।"   "अब रहने दो! वापस तो जा नहीं सकते!" "अरे नहीं! ये तो बहुत ही बुरा है ।  मुझे अमरूद खाना था।" "उफ्फ! बच्चे मत बनो।  कोई मर नहीं रहा बिना अमरूद के।"   "तुम्हें क्या पता? कोई मर जाये तो?"   "अरे छोडो भी अब।" "कैसे छोड़ूँ? अरे अरे!! वो देखो फल का ठेला वहां है।  भैय्या, गाड़ी रोकिये!  मुझे अमरूद लेना है।" "नहीं! नहीं! बिलकुल गाड़ी मत रोकिये, भैय्या! मुझे जल्दी पहुंचना है।  मीटिंग है। हम घर पहुँच जाये तो फिर तुम निकल जाना आम, अमरूद कुछ भी लेने। " "हे राम! ये औरत तो मुझे अमरुद भी नहीं दिला रही है! कितनी ज़ालिम है! भैय्या, अब आप रोक दीजिये बस गाड़ी!"  "अब क्यों? ठेला वाला तो गया।" "अब मैं जमीन में लेट जायूँगा, पैर पटकूंगा, और अपने ऊपर मिट्टी डाल लूंगा!! सब को बताऊंगा ये तो मुझे अमरुद भी नहीं दिलाती है!" "हममम ... रोक ही दीजिये भैय्या गाड़ी फिर! लेकिन १ मिनट के लिए। इसे उतारकर तुरंत भाग जायेंगे - फिर...