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सेंस, सेंसिबिलिटी, और अना

"अच्छा एक बात बताओ! अगर तुम्हारी माशूका होती कोई उसी शहर में या तुम्हारा अज़ीज़ दोस्त किसी हॉस्टल में फसा हुआ होता तो लॉकडाउन 1, 2, 3, या 4  में मिलने जाते?" 

"नहीं यार! बिलकुल नहीं!"

"और लॉकडाउन के बाद? अनलॉक  में?"

"हाँ क्यों नहीं!"

"क्यों यार? ऐसा क्यों करते तुम?"

"अरे!  जोश में होश नहीं खोना चाहिए!"

"अरे बाप रे! फ़िल्मी डायलॉग क्यों दे रहे हो? कौन सा जोश? कैसा होश?"

"अरे लॉकडाउन में मिलना गैरकानूनी था न!"

"अच्छा!! होश कानूनी पानी के छिड़काव से आता है? मैंने सोचा कोई गहरी समझदारी की बात कर रहे हो। कुछ साइंस है इसके पीछे! सोचा तुमने स्टडी किया होगा उस वक़्त कोरोना ज्यादा फ़ैल रहा था!"   

"तुम मिले लॉकडाउन में  किसी से?"

"हाँ बिलकुल! कुछ दोस्तों से मिली थी फेज 4 में! और बहन से.... "  

"अरे क्यों? कितनी स्टूपिड  हो तुम! तुम जैसे लोगों के लिए ही कोरोना फ़ैला हुया हुआ है!" 

"अच्छा!! ऐसा क्यों?" 

"मना था न मिलना? बाहर निकलना गैर कानूनी था!" 

"नहीं! भूल गए तुम शायद, मई के माह से अलग अलग राज्य में अलग अलग चीज़ें खुल गई थी। फिजिकल डिस्टन्सिंग की हिदायत थी।  उसके शर्तो को पूरा किया!  हम कुछ लोग मास्क पहनकर मिले।  जब ग्रीन जोन में थे तब मिले।  खुले जगह  में मिले।  और अपने अपने चाय के गिलास के साथ बैठकर चाय पीये, नाश्ता की। थोड़ा फैलकर बैठे, बस और क्या? और उस बात को हुए दो महीने गुज़रने चला।  वैसे तुम अभी कहाँ हो?"

"अभी तो ....एक रिश्तेदार के घर ... "

"घर के अंदर? हाय हाय!! क्यों? होश कहाँ है अभी? जेब टटोलो!"

"ताना दे लो तुम! तो क्या करूँ? पुरे साल न मिलूं लोगों से? राखी पर तो मिलूँगा न बहन से! तुम नहीं मिलोगी पूरा साल?" 

"हा हा हा हा! अभी अभी इसी मिलने की बात पर मुझे स्टुपिड नहीं  करार दे रहे थे? मेरा तो बस कहना है के कुछ नहीं बदला है, लॉकडाउन और अनलॉक में !  हालात और बद्तर हुई है ! दस लाख से ज़्यादा मरीज़ है इस वक़्त। मार्च में जब लॉकडाउन हुआ तो सिर्फ 600 थे! अप्रैल मई में भी काफी कम थे! तब जिगरी से मिल लेते यार! जो तुम्हारे बिना तड़प रहा था।अब तुम चाचा से उनके घर पर मिल रहे हो।   बंद जगह में। बिस्कुट खाया होगा तो मास्क भी उतारा होगा! कितने लोग बैठे हो साथ में? दूरी कितनी है आपस में? चाचाजी का बेटा किनसे मिल रहा है कैरम खेलते हुए?" 

"छोड़ो तुम!! रिश्तेदारी, रस्मो-रिवाज का तुम्हें क्या पता!! वैसे कैसे नहीं बदला है? गैर-कानूनी तो नहीं है अब, है न? अनलॉक की प्रक्रिया चालू हो गई! सुना नहीं?"

"आह! कानून का मसला है? समझदारी का, जानकारी का नहीं?  वैसे इंसानो का खरीद-फरोख्त भी कानूनी धन्धा हुआ करता था!"

"तुम न -- बस चुप हो जाओ अब। बात बात पर मेरे सेंसिबिलिटी पर सवाल उठाने लगती हो!!" 

"ओह हो! इस में सेंसिबिलिटी भी आ गई क्या? मुझे तो लगा मैं सिर्फ सेंस पर सवाल उठा रही थी! आह! समझ गई! सेंस का हाथ पकड़कर आ गई होगी। सेंस एंड सेंसिबिलिटी सन 1811 से साथ जो है!  तुम बिलकुल सही जा रहे हो!

वैसे हे मर्द महोदय! ज़रा ग़ौर फरमाएं! ये अना है! जिसका इंग्लिश, ईगो, है। न ही उस में सेंस है,  न सेंसिबिलिटी!"


Comments

  1. sahi farmaya aap ne ..............

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  2. Very apt description to male ego- No sense or sensibility ...

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    1. How sad though... Jaan dene ko tayyar par aurat se logic nahi gawara..

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  3. It is like reading hindi saahitya. Very impressive style of writing.

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  4. Men do not have capacity to understand so they explain , just generalizing 😉

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  5. Your blogs are truly profundity in lighter vein. Very difficult combination and rare among writers. May you continue to regale us with your prolificity.

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    1. Thank you so much my friend! You inspire me..

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