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बिना विश्वास के आदमी! जैसे पानी में बहती लकड़ी!

 "तुम सुबह ब्रश करने में विश्वास रखती हो?"

"बहुत! जिसे कहते हैं गहरा विश्वास!"

"अरे वाह!" 

"हाँ यार! कुछ न कुछ में तो विश्वास रखना ज़रूरी है न!"

"बिलकुल।  बिना विश्वास के आदमी पानी में बहती लकड़ी की तरह हो जाता है यार!" 

"सही कहा!"

"पानी से याद आया, तुम सर्दियों में नहाने में यक़ीन रखती हो?" 

"अरे अरे! क्या बात करती हो! अब विश्वास के भंवर में इतना भी मत बहो।अपना दिमाग़ भी कुछ होता है कि नहीं! हर बात पर यक़ीन थोड़े ही कर सकते है?"

"वो भी सही है!"

Comments

  1. Trust bhi kai baar apne comfort ke according karte hai hum..

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  2. सही में सब कुछ विश्वास पे नही चलता, सब विश्वास पर कभी न चले। सवाल करने वाली अक्ल आबाद रहे।

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    1. एक मज़े की बात और हैं,जब मैंने इसकी पहली लाइन पढ़ी, तो लगा मुझसे पूछा जा रहा कि ब्रश करने के बारे में, क्योंकि हाल ही में रुट कनाल कराना पड़ा मुझे,,☺️

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  3. So a winter bath closed the conversation? Understandably so ⛄

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  4. विश्वास पर ही टिके है सारे जज्बात यही बार बार सुनने को मिलता रहता है । यानी दिमाग की बत्ती गुल करना क्योंकि दिमांग पर कब्जा है विश्वास का ।
    ओर विश्वास झूल रहा है झोले में
    मजा आया पढ़कर

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  5. Often, Vishwaas ends up being a matter of convenience. Bathing in winters analogy explains that very well.😀

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    1. That's exactly my point Mi Amigo!! You got it..

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  6. Hahahaha. Bado se ashirwad le sakte hai, 'Sada swaccha raho'

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  7. Bahut kuch me aur apne according vishwas rakhte hain. Vishwas aur buddhi me dwand chalta hai

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