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बस आ ही रहा था मैं!

"ये उस दिन लिखा था जिस दिन झगड़ा हुआ था, झरना और हौज़-ए-शम्सी को लेकर!"  Mehrauli Jharna 
 "अच्छा?! उस पर क्यों?" 
"याद नहीं?"  
"एक तो तुम झगड़ा इतना करती हो यार! याद ही नहीं रहता झगड़ा किस बात पर हुआ था!"  
 "अच्छा!? मै झगड़ा करती हूँ? वो भी इतना के वजह ही याद नहीं होता आली जनाब को?"  
"अरे! सुनो तो! मैंने कहा, झगड़ा इतना होता है कि, यह वाला किस बात पर हुआ याद नहीं!" 
"उसके पहले ये भी बोला कि तुम करती हो! मैं सब ध्यान से सुनती हूँ!" 
"एक तो तुम सुनती इतना क्यों हो और याद भी इतना कैसे रख लेती हो यह भी मुझे समझ नहीं आता !" 
"मजबूरी है! क्या करे? वरना तुम्हारा क्या भरोसा! तुम तो झरना को हौज़-ए-शम्सी कह दो और अपने सारे शुरू किए हुए झगड़े मेरे मत्थे मढ़ दो!" 
"अब देखो! तुम अलग-अलग बातों को मत मिलाओ! झरना कभी भी हौज़-ए-शम्सी नहीं हो सकता,ये तो सही है, लेकिन दूसरे वाले बात की possibility आधी तो है ही न!" 
"हम्म...... वैसे झगड़े भले ही आधे मैं शुरू करूँ, ख़त्म सारे मैं ही कर...

तुग़लक़ी चुड़ैल

'तुम्हे वो चुड़ैल के नए कारनामों के बारे में बताया?' 'कौन सी चुड़ैल? दिल्ली वाली? बंगालन? ठीक है वो?' 'हाँ यार! वही दिल्ली-वाली-बंगालन चुड़ैल !! ठीक तो कुछ ज्यादा ही रहती है, भला उसे क्या होगा! ... पर बड़े ही  तुग़लक़ी अंदाज़ है उसके!' 'तुग़लक़ी अंदाज़ ?! वाह! .... कैसे?' 'हाँ! देखो न अब.... कुछ ही  दिन पहले की बात है , मैंने कहा, "तुम आराम कर लो। इतनी दूर मुझसे मिलने आने की क्या ज़रूरत है? तुम थकी होगी। तुम्हे खामखा तकलीफ होगी " तो बस पीछे ही पड़ गयी! बोली, "तुम्हे कोई problem होगा अगर मैं तुमसे मिलने आऊँ तो?" अब तुम ही बताओ इस बात में  भला मेरी problem की बात कहाँ से आ गई ?' 'फिर?' 'मैंने कहा, "अरे नहीं! मेरी problem की नही, तुम्हारी तकलीफ की बात हो रही है!" 'अच्छा ! तो?' 'बोली, " वो तो ठीक है, पर इस पर बात हो क्यों रही है? मैने तुम्हे कहा की मुझे कोई तकलीफ  होगी?" ' 'ये तो सही पूछा । कहा था उसने के तकलीफ होगी?' 'अरे तुम भी न। आदमी की समझ-बुझ भी कोई चीज़ ह...

लॉजिक की देवी और उनके भक्त

"कल तुम कितने बजे आ रहे हो?" "सुबह के पांच बजे । " "मैं आऊं एयरपोर्ट पर ?" "नही ! पागल हो तुम! " "अच्छा!? वैसे सच बताओ एयरपोर्ट के बाहर मैं मिली तो बहुत ज्यादा हैरानी होगी तुम्हे?" "तुम ना नही आ रही हो। ओके?" "हमम! वैसे तुम्हे पता है न ऐसे मुझसे बात करना खतरे से खाली नहीं है? " "अरे यार! मत आना प्लीज!! ऐसे बोलने पर चलेगा? " "अरे ये तो बताओ बहुत हैरानी होगी अगर मैं दिख गई बाहर?" "नहीं यार! तुम्हारा क्या ! तुम तो कुछ भी कर सकती हो!!" "अब  ठीक है! बिल्कुल ठीक! मुझे तो शक़ हो रहा था इतने समय में जाना भी है ठीक से मुझे, के नहीं!! " "चलो अब तो clear हो गया न? कोई challenge नहीं कर रहा तुम्हे।  मत आना तुम प्लीज।" "क्यों? कोई और होगी तुम्हारे साथ? " "हाँ! अब सही समझी। कितना देर लगाती हो!" "अरे वाह! फिर तो ज़रूर आती हूं और रेटिंग्स भी देती हूं। दस में से सही रहेगा?" "नही नहीं!  रेटिंग नही चाहिए! कोई रेटिंग क...

अंदर की बात!

"सुनो! तुम्हारा पति कंसलटेंट है न? मुझे जॉब देने बोलो!"  "हममम सॉरी! आपकी जानकारी काफी पुरानी है। मेरा बहुत सालों से कोई पति नहीं है! वैसे सच पूछिए तो "पति" तो कभी कोई नहीं था।  मेरे पे मिलकियत कभी किसी की नहीं रही!!"  "अरे तुम फेमिनिस्ट टाइप्स भी न! मिलकियत छोड़ो! ये बताओ, उसने तुम्हे क्यों छोड़ दिया?" "अच्छा!! छोड़ देना ज़रूरी है क्या? अलग नहीं हो सकते?"  "अरे ऐसे कैसे! कुछ तो हुआ होगा!"  "जिस दिन क़िस्सा-गोई का मन बनाउंगी सबसे पहले आप को ही बताउंगी! फर्स्ट रौ में सीट ले लेना आप!"  "अरे कुछ  तो  बताओ! अंदर की बात! शर्माती क्यों हो? ऐसे और बहुत से क़िस्से मैं जानती हूँ! Let's discuss!"  "अच्छा?! ऐसा है क्या? Actually क्या बताऊँ!  बहुत ही unreasonable था वो ! बस एक दिन मैं शराब पी कर आयी और गुस्से में एक चांटा लगाया। एक ही! कसम से।  बस!! इतने से बात पर चला गया छोड़कर!! इतने से कोई जाता है क्या? आप ही बताइये! शादी के बाद ये घर ही उसका अपना घर था न? पर चला गया! क्या ज़माना आ गया है...

मोल भाव

"एक बात पूछनी थी।  पर्सनल सा है... " "हमम!" "पूछूँ ?" "पूछ लो।  पूछने का परमिशन है।  पर जवाब की गरंटी नहीं!" "तो फिर रहने दो!" "अरे! रिस्क भी तो कोई चीज़ होता है।  नहीं पूछा तो जवाब न मिलना पक्का है! पूछो तो फिफ्टी! फिफ्टी!!" "अच्छा बढ़ाओ थोड़ा!  पचहत्तर कर लो!" "अरे नहीं नहीं! पचहत्तर  बहुत ज्यादा है! साठ कर सकती हूँ!" "कोशिश तो करो! हो जायेगा।"  "अच्छा चलो! न तुम्हारी न मेरी!  सत्तर पर फाइनल करते है! इससे बेहतर गारंटी कहीं नहीं मिलेगा! बता देती हूँ!' "उफ़्फ़ ये जान लेवा है मोल भाव तुम्हारे!!" 

हर गुलाबी , गुलाबी नही होता!

"अच्छा ये साड़ी देखो!" "हमममम....." "ओके! हमममम है। उमममम नही।" "हां यार । क्या बताऊँ , गुलाबी मुझे पसंद नही!"  "अच्छा?! और ये साड़ी का क्या? पिछले साल तो बहुत ही पसंद आई थी ये! " "ये? ये तो बहुत ही अच्छी है यार!  तुम भी कमाल करती हो! अब हर गुलाबी , गुलाबी थोड़े ही न होता है!! " "तो गुलाबी पसंद नही मतलब क्या? कैसा गुलाबी? पिंक नहीं पसंद, के मैजंटा? पॉवडर पिंक?  फ्यूशिया पसंद है? या फ्यूशिया ही वो गुलाबी है जो तुम्हे पसंद नही?" "अरे बाप रे! ये सब क्या है?" "सब गुलाबी है! " "मुआफ़ करो!! बख्श दो! गुलाबी पसंद है मुझे!"

नाम में क्या रखा है!

"इन का नाम क्या बताया? ज़रा फिर से बताइये!" "अरे नाम में क्या रखा है!" "सो तो है, पर बहुत खूबसूरत है!" "अच्छा?! नाम? के ये?" "उमममम ..... दोनों !"