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Showing posts from 2020

भूलने और ऑलमोस्ट भूलने में फ़र्क!

  "हैलो एकता!" "एकता?! मैं एकता टावर में रहती हूँ ज़रूर पर नाम मेरा एकता नहीं है!" "ओह हो! सॉरी सॉरी!! भूल ही गयी थी ऑलमोस्ट! तुम्हारे नाम के साथ अपार्टमेंट का नाम लिख कर रखा था, गलती से वो ही निकल गया!" "अच्छा! बताइए ... कुछ काम था? " "मुझे एक २४ घंटे की कामवाली चाहिए।  दिला दो न! वही जो रात में भी रहती है - " "मैं कहाँ से दिलवा दूँ .... " "ओह हो! रुको एक मिनट।  भूल ही गयी थी ऑलमोस्ट! Let me ask you  तुम्हारी कैसी कट रही है इस कोरोना के समय में।  वैसे तुम बंगाली 'कोरोना, कोरोना' तो वैसे भी करते रहते हो।   देखा था व्हाट्सप्प में मैंने --   तुम्हारे लिए तो ये कुछ भी नहीं - हाहाहा!! " "जी मैं ठीक हूँ।  पर अभी ऑफिस के काम में व्यस्त हूँ।  तो अभी बहुत बात नहीं कर सकती और न ही किसी २४ घंटे की कामवाली का पता है मुझे..... " "अरे रे! मुसीबत हो गई।  मुझे लगा तुम्हे ज़रूर मालूम होगा! गरीबों के साथ इतना काम की बात करती हो तुम!"  "कौन? एकता?"  "मज़ाक क्यों करती हो? बोला न  ऑलमोस्ट  भूल गयी...

बिना विश्वास के आदमी! जैसे पानी में बहती लकड़ी!

  "तुम सुबह ब्रश करने में विश्वास रखती हो?" "बहुत! जिसे कहते हैं गहरा विश्वास!" "अरे वाह!"  "हाँ यार! कुछ न कुछ में तो विश्वास रखना ज़रूरी है न!" "बिलकुल।  बिना विश्वास के आदमी पानी में बहती लकड़ी की तरह हो जाता है यार!"  "सही कहा!" "पानी से याद आया, तुम सर्दियों में नहाने में यक़ीन रखती हो?"  "अरे अरे! क्या बात करती हो! अब विश्वास के भंवर में इतना भी मत बहो।अपना दिमाग़ भी कुछ होता है कि नहीं! हर बात पर यक़ीन थोड़े ही कर सकते है?" "वो भी सही है!"

निकम्मा फेसबुक!

"अरे तुम्हें  पता है माँ काफी गुस्से में थी आज!"  "क्यों?" "बोली ,कि मैं दिखती नहीं हूँ फेसबुक पर उन्हें। उनसे छुपाकर काम करती रहती हूँ अपना।"   "तो तुमने क्या बोला?" "मन तो हुआ पूछूं कि 'देखना क्या है?' फिर भी समझाने की कोशिश की, कि मेरे पोस्ट्स देखने के लिए उन्हें लाइक करते रहना होगा।" "तो?" "बस गुस्सा हो गईं! बोलीं, 'पसंद न आये तब भी? काम तुम्हारे पसंद करने लायक होते तो है नहीं! लाइक किस बात का दूँ?'" "अब कौन उनको एलगोरिदम  समझाए!" "वही तो! उनकी शिकायत  ये है कि फेसबुक हमारे छोटे शहर के पडोसी की तरह क्यों नहीं बन जाता?" "कैसे?" "तुम चाहे कितना भी अनदेखा करो अपनी लड़की को, वो आ कर बताकर जाएंगे, 'आज देखा आपकी लड़की को वहां पुराना किला के पीछे सेल्फ़ी खींच रही थी किसी अधेड़ उम्र के आदमी के साथ! और फिर तो कुछ हद्द ही हो गई! मैंने देखा कि  कोई छोटे से लड़के के साथ  गले में हाथ डाले घूम रही है सुन्दर नर्सरी में। कितना हस हस कर बातें कर रहे थे दोनों - क्या बताऊँ मैं आपको!...

मेरा favourite pastime!

 "तुम्हारे बाल झर रहे है! लटक रहे है कंधे के पास देखो !"  "कहाँ है? हाथ में नहीं आ  रहा!" "अब देखोगे तब न! रुको मैं निकालती हूँ!" "अरे तुम कैसे निकालोगी?" "हाथ से, और कैसे?  ये लो! अब ये गया कचरे के डिब्बे में" "कहाँ?! मुझे तो दिखा नहीं! सच में था क्या?' "नहीं! मैं झूठ बोल रही थी! झरे हुए बालों के बारे में झूठ बोलना तो  मेरा favourite pastime है   !"  "अरे झूठी थोड़े ही बोलै मैंने? अब देखो गलती भी हो सकती है! सोचा था है, पर है नहीं!' "नहीं नहीं!! मुझे benefit of doubt देने की बिलकुल ज़रुरत नहीं! झूठ ही बोला होगा मैंने!" "अरे हाँ! मुझे इस वहम में कतई नहीं रहना चाहिए के तुम से  ग़लती से हो गया  ये,   हो  तो  तुम चुड़ैल  की जात  ही आख़िर! तुम्हारा क्या भरोसा? बालों से जाने क्या क्या कर दो!" "हाँ! हाँ! क्यों नहीं? देखो जा कर आईने में! कहीं नीली चमड़ी वाले सियार तो नहीं बन गए? जाने कब से  हुआ-हुआ किए जा रहे हो!"

मर्द तो मर्द का दोस्त होता है न?

"दीदी, एक बात बोलनी थी... "  "बोलो"  "हममम ...... " "अरे बोलो तो। उदास चेहरा बनाकर डराओ मत।"  "दीदी, वो एक लड़की रहती थी न मेरे पास, नीता, जिसकी शादी कराई थी मैंने, अब बोल रहे हैं चली गई वो घर छोड़कर, बच्चों को ले कर, परसो। बोल रहे हैं-कहीं नहीं मिल रही।"    "मतलब क्या? ख़ुद चली गई या बच्चों समेत उठाई ली गई?"  "नहीं। ख़ुद गई।  एक कपडे में.... कुछ ले कर भी नहीं गई।  देखा बोलती है पड़ोसन ने किसी के साथ, पर वो अब मुंह नहीं खोल रही है।" "अच्छा! फिर तो सब ठीक है! उसे किसी से प्यार हुआ होगा, खुद अपने मन से गई और बच्चों को ले कर गई।  ठीक होगी फिर तो। तुम क्यों परेशान हो?" "अरे दीदी! शादी मैंने करवाई थी न! अब फ़ोन करके बोल रहे हैं, 'आपने अच्छी लड़की बोला तो हमने शादी कर ली, अब भाग गई!'" "छह साल पहले बोला था न! अब क्या है? छह साल में दुनिया कहाँ से कहाँ चली जाती है।" "सो तो है दीदी! पर ये लड़की भी कैसी है! सुना है मारता भी नहीं था पति उसका।  बताओ! फिर भी चली गई!!"  "हाँ ये तो गलत ब...

दुनिया की सबसे पुरानी कहानी, दूध का दूध और पानी का पानी!

 "क्या हुआ?" "अरे वही! दुनिया की सबसे पुरानी कहानी, दूध का दूध और पानी का पानी!"  "अरे कमाल! पर ये हुआ कैसे?"  "बड़बोले भाईसा'ब कल निकल लिए चोरों की तरह।" "क्या बात करती हो! बड़ा दूध का धुला लगता था वो तो, कम से कम उसकी अपनी बातों से।"   "हाहाहाहा! एक गड़बड़ हम में क्या है जानते हो? वो जो एक तो करेला उपर से नीम चढ़ा होते है न - पता नहीं हम क्यों उन्हें सच्चा भी मान लेते है!"  "अरे अपना ढोल  कोई  खूब पीटे तो आवाज़ तो फिर भी होती ही है न? जानते तो हम है के अधजल गगरी छलकत जाए, पर भूल जाते है!!  इनकी सुनो तो इनसे बड़े सच्चे, क्रांतिकारी, मानविकता से भरपूर लोग है ही नहीं! पर बस देखते रह जाओगे के पहला मौका लगते ही चोरी पर उतर आते है! पता नहीं तब सच्चाई कहाँ जाती है!"  "आह! अब से ऐसे मियाँ मिट्ठू की आवाज़ आते ही सोच लेना पड़ेगा की दाल में कुछ काला है!" "और बता भी देना के यहाँ उनकी दाल नहीं गलेगी!" "ठीक!" "और हाँ! इन थाली के बैगनों को कोने में सरकाकर ही रखो! और शक्ल दिखाने आए तो बोल दो, "मि...

फिर न कहिए कि मुद्दआ कहिए!

"पर बताओ, मैं इतनी ख़राब हूँ क्या? छुपाकर रखने लायक?" "हम्मम!" "अरे मैंने भी क्या पूछ लिया! जाने दो! जवाब मत दो!" "हाँ!" "हाँ, क्या?" " दे दिया! सवाल का जवाब!" "आय हाय! इतनी ख़राब हूँ मैं? तुमने उनसे agree किया? ठीक है! कोई बात नहीं! कहिए कहिए मुझे बुरा कहिए ...ज़ालिम दुनिया! " "अब देखो ख़ुद को! ज़िक्र मेरा, उम्म्म मेरा मतलब है, ज़िक्र सच का सुना तो चिढ़ के कहा, किस दिवाने की बात सुनते हो!!" "अरे रहने दो अब! दाग़ से जावेद क़ुरेशी तक मत भटको! सदियों भटक जाओगे!! वो भी ग़लत सलत! वो कहते है न, आप अब मेरा मुँह न खुलवाएँ, ये न कहिए कि मुद्दआ कहिए  -  अब तो बोल ही दिया तुमने..." "जान क्यों जलाती हो? तुझ को अच्छा (भी) कहा है (जाने) किस किस ने, कहने वालों को और क्या कहिए!" "ओय होय!! शुक्र है!! वापस तो आए दामन ए दाग़ में... ताना ही सही! आ गई आप को मसीहाई , मरने वालों को मरहबा कहिए ... "   "तुम मरने वाली हो?" "नहीं! नहीं! मैं नहीं! दाग़! उन्होंने कहा ये!" "अरे अरे! उम्मीद स...

इंसान और स्मारक या इंसानी स्मारक?

"अच्छा ये तो बताओ के  तुम उन्हें तुग़लक़ाबाद का क़िला क्यों बुला रही हो? वो ख़ुद को पत्थरों की दीवारों से घेरकर रखती हैं, इसलिए? "अरे नहीं! सिर्फ़ वो नहीं! तुग़लक़ाबाद के क़िले के बारे में अच्छे से सोचो।" "उसके बारे में क्या?" "बाहर से कितना सुन्दर  दिखता है वो! महरौली- बदरपुर  रोड पर से जाओ तो ऑंखें नहीं हटेंगी तुम्हारी। वो मुहार! वो हाइट!  वो सुन्दर रंग!  पर अगर तुम उससे  खिंच कर अंदर  चले गए तो उजाड़ है बिलकुल! खोखला! कुछ नहीं है अंदर।"   "वो वैसी है क्या?" "हाँ!" "अच्छा। और तुम ख़ुद कौन से मोन्यूमेंट हो?"  "हम्म्म .. पता नहीं यार! शायद बड़ा इमामबाड़ा। भूल -भुलैया समेत!"   "ये कहाँ है?"  "लखनऊ में।"  " वो तुम कैसे?" "एक दीवार के कान में चुपके से कुछ कह दो,  तो सबसे दूर के दीवार से भी वही आवाज़ गूंजती है।  हर हिस्से को पहुँच जाती है कोई भी आवाज़। कोई हिस्सा अनछुआ नहीं रह  जा ता!  और अभी तक किसी को ये समझ नहीं आया के तीन मंज़िला गुम्बद  किसी सहारे के बिना खड़ा कैसे है!!   "  "अच्छा?...

ख़ुश रहो! आबाद रहो!

"ये हमारा अपार्टमेंट है न - हमारी काम-वाली दीदी बोलती है ये बनते हुए एक इंसान मर गया था! और वो  बगल वाले में भी! बोलते है दोनों को रातों रात इमारत के नीचे गाड़ दिया।" "अच्छा? फिर?"  "हाँ! फिर उनके कपड़े छुपा दिए, झोपड़ी खाली कर दिया। ढाई तीन महीना बाद घरवाले पूछने आए तो बोले, "वो तो पिछले महीने यहां से छुट्टी करके गाँव को निकला था ! पंहुचा नहीं अभी?" "हाय हाय!! डराओ मत! " "बोलते हैं, घर बनाते हुए कोई न कोई ढेर होता है।  हर घर के नीचे किसी न किसी की लाश मिलती है।" "हम्म्म .. " "एक आधा  घर के नीचे शायद मेरा भी है!" "क्या अनाब सनाब बोलती हो तुम भी! गुस्सा करूँ?"  "नहीं करो।  सुनो बस। मेरी लाश पर बना घर भी होगा दुनिया में। अच्छा एक बात बताओ! घर तो बड़ा सुन्दर दिखता है , लाश को जाकर अगर घर की सुंदरता के बारे में बताएं  तो लाश को कैसा लगेगा ?" "बोला था डराओ मत! अभी फ़ोन बंद हो जाएगा! तब पता चलेगा तुम्हें! "  " धमकी?" "और नहीं तो? देखो! तुम लाश छोड़ो! घर छोड़ो! तुम सुन्दर कितनी  हो...

चुड़ैल की झाड़ू!

"आज सुबह सुबह ही रो ली"  "उफ़! इसलिए ऐसी आंखे है!! क्यों भाई?" "अरे मेरा जो घाव है न आते जाते दस बार छू जाता है दिन में और खून रिसता है दिन भर!"   "तो छूती क्यों हो तुम उसे?"  "भरा के नहीं देखना नहीं होगा?"  "नहीं नहीं! तुम्हे देखने की क्या ज़रुरत? बस! बैंडेज बदलवा लिया करो वो इंजेक्शन ट्रे वाले नर्स से शनिवार! छूओ मत! गुज़रो भी मत उधर से!"  "ठीक बोला! सोचती हूँ शहर ही छोड़ दूँ! इसकी गलियां छू देती है!" "कहाँ जाएगी? ए जोड़ीदार! वहाँ कौन है तेरा?"  "कोई भी मेरी राह न देखें! आँख बिछाए न कोई!!" "तो फिर?" "पर भूल न गए वो! और मुझे भी भुलाने की ज़रुरत नहीं! ये अच्छी बात है के नहीं?"  "अच्छा! ये तो बताओ दुखता कहाँ है?' "दिल में " "तो जोड़ीदार मेरे! दिल यहीं छोड़ जाना!" "अरे क्या बात करती हो! सुबह सुबह चढ़ा ली?" "तो बेकार का जाना है जानेमन! जहाँ जाओ, तेरा पीछा न ये छोड़ेगा सोणिये! भेज दे चाहे जेल में!!" "उफ़्फ़! कुछ भी रास्ता मत छोड़ो मेरे लिए! ...

एक पंथ दो काज!

 "अच्छा सुनो! एक हार दिखाना था..." "दिखाओ" "ये लो!"  "ये तो साड़ी है!"  "अरे हार भी है देखो तो!" "ओह ये हार है? ऐसा तो पायल होता है!" "इतना चौड़ा? साफ़ दिख रहा है हार है! " "अरे दो  पायल  रख दो एक साथ! हो गया बस।"   "कुछ भी बोल दो बस! अच्छा है के नहीं बताओ।"   "अच्छा तो है।  कितने का है?" "अब कीमत तो देखो कुछ  ज़्यादा ही है! !"  "अरे राम राम! मत खरीदो! मेरे मम्मी के पास बिलकुल ऐसे वाले है.... पायल।"   "तुम्हारे मम्मी के पास है तो मैं क्या करूँ? चोरी करके लाओगे मेरे लिए?" "हाँ लाता हूँ! अगली बार। पक्का!"  "कब जाओगे फिर घर?" "जल्दी है तुम्हे?" "हाँ एक पंथ दो काज! मुझे हार मिल जायेगा और तुम जेल चले जाओगे। तो ये बकवास भी नहीं सुनना पड़ेगा।  आजकल कोविड का टाइम है, मिलने नहीं देते!" "अरे ऐसे नहीं बच सकती तुम! ई-मुलाकात जारी है!" "हे राम!!"

सेंस, सेंसिबिलिटी, और अना

"अच्छा एक बात बताओ! अगर तुम्हारी माशूका होती कोई उसी शहर में या तुम्हारा अज़ीज़ दोस्त किसी हॉस्टल में फसा हुआ होता तो लॉकडाउन 1, 2, 3, या 4  में मिलने जाते?"  "नहीं यार! बिलकुल नहीं!" "और लॉकडाउन के बाद? अनलॉक  में?" "हाँ क्यों नहीं!" "क्यों यार? ऐसा क्यों करते तुम?" "अरे!  जोश में होश नहीं खोना चाहिए!" "अरे बाप रे! फ़िल्मी डायलॉग क्यों दे रहे हो? कौन सा जोश? कैसा होश?" "अरे लॉकडाउन में मिलना गैरकानूनी था न!" "अच्छा!! होश कानूनी पानी के छिड़काव से आता है? मैंने सोचा कोई गहरी समझदारी की बात कर रहे हो। कुछ साइंस है इसके पीछे! सोचा तुमने स्टडी किया होगा उस वक़्त कोरोना ज्यादा फ़ैल रहा था!"    "तुम मिले लॉकडाउन में  किसी से?" "हाँ बिलकुल! कुछ दोस्तों से मिली थी फेज 4 में! और बहन से.... "   "अरे क्यों? कितनी स्टूपिड  हो तुम! तुम जैसे लोगों के लिए ही कोरोना फ़ैला हुया हुआ है!"  "अच्छा!! ऐसा क्यों?"  "मना था न मिलना? बाहर निकलना गैर कानूनी था!"  "नहीं! भूल ...

थोड़ा सा रूमानी हो जाए!

"अभी वीडियो कॉल नहीं कर सकती! ईयरप्लग लाना भूल गई और उबर में हूँ!" "उबर कब से हो गया! तुम्हारा तो इउ-बर था न?" "बस एक गलती होने की देर और चिपट जाओ तुम!"  "अच्छा नहीं चिपटता! कैमरा ऑन करो तुम !"  "क्यों? ज़ोर ज़ोर से सुनाई देगा! टैक्सी में हूँ!" "सुनाई देने दो!  मदद चाहिए मुझे। " "अच्छा ये लो!"  "अब बताओ इतना जीरा पॉवडर ठीक है ? अंडा करी बना लेता हूँ आज।  क्या बोलती हो?" "सही है! पर जीरा कितना है?" "जितना दिख रहा है उतना ही!" "अरे ऐसे थोड़े ही समझ आता है? चम्मच से बताओ।  कितना चम्मच लिया था?" "रुको! नाप कर देखता हूँ! " "धनिया लिया?" "हाँ! धनिया बताओ! आमचूर भी है!" "टमाटर डालोगे न? फिर आमचूर क्यों?" "चटपटा बनेगा!"  "अरे नहीं! ज्यादा हो जायेगा! या तो टमाटर डालो या आमचूर! अचारी बिरियानी बनानी है क्या?" "उफ़्फ़ क्या याद दिला दिया! चलो आमचूर कैंसिल! प्यांज़ देखो कितना बढ़िया कटा है!" "वाकई बढिया है! अब चालू हो जाओ!...

बुद्ध से शून्य हो कर अनंत तक!

"ये बुद्ध जयंती को बुद्ध पूर्णिमा क्यों बोलते है ?" "जयंती भी बोलते है, पर पूर्णिमा के दिन आता है न! तो पूर्णिमा भी बोलते है।"  "पूर्णिमा बहुत ही ब्राह्मण-वादी शब्द नहीं है?" "अरे नहीं नहीं!! बौद्ध धर्म के लोग पूर्णिमा को लेकर काफ़ी एक्साइटेड रहते हैं! श्रीलंका में तो हर पूर्णिमा को छुट्टी रहती है।" "सच में?! साल में बारह छुट्टी?"   "हाँ!" "सही है! तुम गई हो श्रीलंका, है न? तभी तुम्हें इतना पता है !" "अरे नहीं! उस वजह से नहीं।  मैं ठहरी आलीम फ़ाज़िल! मुझे सब पता है!"  "नहीं नहीं! इतनी भी कुछ ख़ास नहीं हो!" "अरे हूँ यार! आत्म-ज्ञान है मुझे।"   "बड़ी आई आत्मज्ञान वाली!! दूसरे का भी दृष्टिकोण कुछ होता है आख़िर! उसका भी ज्ञान ले लो।"  "उम्म्म.... दूसरे विषयों पर दूसरों का ज्ञान ज़रूर ले सकती हूँ! दो!" "अच्छा? किस विषय पर दूँ?" "अब ये भी बात है! किस विषय पर भला!?" "तुम न! उड़ो मत ज़्यादा! गणित पर चाहिए के कंप्यूटर पर? स्टेटिस्टिक्स? या सीधा artificial intel...

जात न पूछो फेमिनिस्ट की!

"सुनो! तुम अजीब तरीके से सोते हो!  जला हुआ हाथ ढक कर सोना!" "पक्का?! हाथ  धो कर नहीं?"  "धोना क्यों है? रुई से साफ़ कर लो और बैंडेज से ढक लो!" "या ख़ुदा!! क्या करे इस औरत का! इसने तो ह्यूमर बेच कर फिश-फ्राई खा लिया लगता है! "  "याददाश्त  बेचकर पेप्सी पी* थी  और  अब ह्यूमर बेच कर फिश फ्राई?"  "अब ऐसा ही है तुम्हारा तो! जाने कब क्या कर लो!" "देखो! मैं दिलवाली हूँ।  सेल पर बेस्ट चीज़े चढाती हूँ।   याददाश्त  बेचना पड़े तो मेरी !  और ह्यूमर बेचना पड़ा तो तुम्हारा!"   "अच्छा?" "और नहीं तो? ईमान-धरम भी कोई चीज़ है! अब तुम्हारी  याददाश्त   बेचते हुए, 'ले लो! ले लो! ऐसी याददाश्त कहीं नहीं मिलेगी!   ऑफर में है!  ले लो! ' ऐसा  तो  नहीं बोल सकती न!" "ओह हो! क्या सही जा रही हो।  पर लगता है, सही  बनिया  नहीं  बन पाई तुम जात से!"  "देखिये! जात पर मत जाइये! हम रेसिस्म से सख़्त परहेज़ करते है!" "आह! जात न पूछो फेमिनिस्ट की, मत भू...

रशियन नॉवेल जैसी ज़िन्दगी!

"सुनो! आज एक  बहुत अच्छी बात हुई! शांति का एडमिशन हो गया!!" "अब ये शांति कौन है?!" "अरे रे! तुम भी यार! कुछ भी नहीं याद रहता!" "देखो! एक तो तुम अचानक नया किरदार ले धमकती हो!  और साथ में एक धमाकेदार बात भी जोड़ देती हो।" "कैसे?" "जैसे, सफी चाँद पर चला गया! अब कौन सफी? किस दिन का चाँद? चला क्यों गया?! री -एंट्री भी एक इंट्रो के साथ होता है भाई! ये नहीं के बस यूँ ही आ धमके!" "हमममम!! मैंने माना के मेरी ज़िन्दगी कुछ कुछ रशियन-नॉवेल जैसा है! कुछ ज्यादा ही किरदार है इसमें। पर तुम ये तो मानोगे के कहानी बहुत दिलचस्प है?" "उफ़्फ़!" "और अब तुम भी इसी कहानी का हिस्सा हो,  तो   आदत डाल लो! फोटो देखोगे  उसका ?" "बिना दिखाए तुम कहाँ मानोगी?" "मान तो मैं जाउंगी, पर तुम्हारे लिए ठीक नहीं है !" "ऐसा क्यों?" "बोलते है,  दृश्य से जुड़ने से यादें पक्के हो जाती है।  तुम्हारी याददाश्त  का हाल देख ही रहे हो!   फोटो बेहद ज़रूरी है!" "कुछ भी  बोलो अब त...

एवरेज-सी-हाज़िर-जवाबी!

"अर्ज़ किया है....  लबो-गुलाब के हम नहीं क़ायल*, जब तक न पुकारे नाम मेरा या कोई छाप न छोड़ जाए जिस्म पर मेरे!" "क्या बात करते हो!! नहीं नहीं! तुम्हारे लबो-गुलाब के क़ायल तो हम हर पल है!"  "सुना है एक नयी मशीन आने वाली है! लबो-गुलाब* की फोटोकॉपी करने के लिए! तुम्हारा प्रॉब्लम जल्दी ख़तम हो जायेगा!"  "अरे वाह! असली मुझे भेज देना।  फोटोकॉपी तुम रख लेना! काम चल जायेगा तुम्हारा!"  "हाहाहाहाहा!! इसी हाज़िर-जवाबी पर तो मरते है जानेमन!"  "बस?" "हाँ! और क्या?  बाकि  तो   सब एवरेज ही है तुम में!!"  "अच्छा?!"  "हाज़िर-जवाबी ही है बस!  और  शुक्र करो वो है!  वो न होता तो तुम नज़र भी नहीं आती!" " आय हाय! सच में?" " एकदम!  तुम्हारा पूरा तारुफ़* बताऊं तो, 'एवरेज-सी-हर-फन-मौला*-हाज़िर-जवाब-वाली! इनकी कोई शाखा नहीं है!!' " "हममम... और तुम बद्तमीज़  हो! कभी मैंने टैटू करवाया इसका, तो जान लेना तुम्हारा ही नाम लिखवाया है!"  "सही है! टैटू करवा ही ...

दिल, दोस्ती, और हम!

"क्यूट!"  "कौन?" "ये लड़का! जिसका फोटो भेजा तुमने।"  "अच्छा?!" "हाँ यार! कौन है ये? बताओ तो इसके बारे में!"  "अरे नहीं बता सकती! टॉप सीक्रेट है !! " "क्या यार!! मुझे भी नहीं बता सकती?" "हाँ! तुम ना फोटो डिलीट कर देना।  उसे अच्छा नहीं लगेगा कि मैंने ऐसे ही शेयर कर लिया किसी के साथ!"   "क्या बात कर रही हो? ऐसा तो बिल्कुल नहीं लगा फोटो में! यहां तो काफी ब्रॉड माइंडेड लग रहा है!  मेरी बात तो करवाओ उससे तुम!" "अरे अरे!! तुम भी न! भोले हो बहुत, इसलिए कन्फ्यूज् हो गए! ब्रॉड फोर-हेड से ब्रॉड-माइंडेड होने का कोई   ताल्लुक़  नहीं!"  "हा हा हा हा हा हा!! (वैसे देख रहा हूँ मैं सब! बस मौका मिलना चाहिए तुम्हे मेरे फोर-हेड पर तंज कसने का!)  खैर ये तो बताओ ओपन-माइंडेड है या नहीं?"  "अब उसके तो लेवल्स है न! काफी मूडी टाइप है। कभी अच्छे मूड में हुआ तो मर्दों से बातचीत में दिलचस्पी है के नहीं पूछ कर देखती हूँ।"  "मूडी है!? फिर तो रहने दो! फोटो में तो दिलचस्प लग...

कुछ इश्क़! कुछ काम!

"सोच रहा हूँ बाल और छोटे करवा लूँ!" "क्यों? अभी तो बोल रहे थे बढ़ाना है।"    "सोचा तो था, पर बढ़ेगा नहीं! समझ आ गया मुझे! तो एकदम छोटे करवा लेता हूँ। क्रू कट! क्या बोलती हो ?"  "करवा लो! घर की खेती है।"   "तू म  भी करवा लो।"   "अरे! अब मैं क्यों कराऊँ?"  "क्यूट लगोगी!" "अच्छा?!" "हाँ यार! वैसे तो कभी लगती नहीं हो।  बाल छोटे करा के देख लो! शायद बात बन जाये!" "क्या बोला!! हमममम .... . आप को ठीक दो मिनट का टाइम दिया जाता है इस वाक्य को दुबारा सोचकर बोलने के लिए ! Or this will be forever held against you in the court of ....." "अरे अरे! तुम भी न बेकार में भड़कती हो!  मैं  तो ये  बोल रहा था, इतना ज्यादा क्यूट लगना दुनिया के लिए खतरनाक हो सकता है। इसलिए बाल छोटे करवा लो। क्यूटनेस कम हो जाये थोड़ा, तो दुनिया-वाले काम भी कर लें !" "अब ठीक है! "

लजीज़ और खुश-ज़ायका!

"कल जब हम मिले तुम  बहुत ही cute लग रही थी!" "जब मिले तब? बाद में नहीं?" "हाँ यार! बस दो चार सेकंड के लिए! बाद में तो नॉर्मल हो गयी!" "वाह वाह! बड़प्पन देखो तुम्हारा! दो चार सेकंड याद भी रखा और बोल भी रहे हो!"  "वो तो  मेरा दिल है ही थोड़ा बड़ा! पर अभी मैं ऑफिस कॉल में हूँ! तुम party- return!! मुझे तंग मत करो!" "तुम ऐसे लेटे लेटे ऑफिस का कॉल कर रहे हो?" "हाँ पियक्कड़!!" "अरे बहुत शोर है यार बारापुला के रस्ते में! तुम मुझे प्रिये बोल रहे हो और  मुझे पियक्कड़ सुनाई दे रहा है!" "मैं पियक्कड़ ही बोल रहा हूँ!" "बताओ! जनाब लुढ़क रहे है! फैले हुए हैं! काम भी किसी तरह लेटे लेटे हो रहा है! और मुझ पर ये सब इल्जाम!"  "अब क्या करें! अंदर तक जकड लिया है तुमने! जड़ें और फैले, इसलिए फैला हुआ हूँ मैं! बस इसीलिए लुढ़का हुआ-सा दिखता हूँ!"  "वैसे हमने  साल भर पहले सोचा था ये जड़ों का  फैलना, रगों में दौड़ना कुछ ही समय के लिए होता है! फिर दुनिया-दारी! रस्मों-रिवाज़!"   ...