"ये उस दिन लिखा था जिस दिन झगड़ा हुआ था, झरना और हौज़-ए-शम्सी को लेकर!"

"अच्छा?! उस पर क्यों?"
"याद नहीं?"
"एक तो तुम झगड़ा इतना करती हो यार! याद ही नहीं रहता झगड़ा किस बात पर हुआ था!"
"अच्छा!? मै झगड़ा करती हूँ? वो भी इतना के वजह ही याद नहीं होता आली जनाब को?"
"अरे! सुनो तो! मैंने कहा, झगड़ा इतना होता है कि, यह वाला किस बात पर हुआ याद नहीं!"
"उसके पहले ये भी बोला कि तुम करती हो! मैं सब ध्यान से सुनती हूँ!"
"एक तो तुम सुनती इतना क्यों हो और याद भी इतना कैसे रख लेती हो यह भी मुझे समझ नहीं आता !"
"मजबूरी है! क्या करे? वरना तुम्हारा क्या भरोसा! तुम तो झरना को हौज़-ए-शम्सी कह दो और अपने सारे शुरू किए हुए झगड़े मेरे मत्थे मढ़ दो!"
"अब देखो! तुम अलग-अलग बातों को मत मिलाओ! झरना कभी भी हौज़-ए-शम्सी नहीं हो सकता,ये तो सही है, लेकिन दूसरे वाले बात की possibility आधी तो है ही न!"
"हम्म...... वैसे झगड़े भले ही आधे मैं शुरू करूँ, ख़त्म सारे मैं ही करती हूँ! वरना आली जनाब का बस चले तो झगड़ा हुआ नहीं कि जैसे झोला उठा कर निकल पड़े!!"
"ऐसा कब किया मैंने? कुछ भी मत बोलो तुम अब!"
"तो अभी पिछले हफ़्ते क्या किया था?"
"अरे! वो तो ऐसा हुआ कि तुम पहले पँहुच गई! वरना मैसेज लिखते, डिलीट करते मैं भी बस आ ही रहा था तुम्हारे पास!"

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| Mehrauli Jharna |
"अच्छा?! उस पर क्यों?"
"याद नहीं?"
"एक तो तुम झगड़ा इतना करती हो यार! याद ही नहीं रहता झगड़ा किस बात पर हुआ था!"
"अच्छा!? मै झगड़ा करती हूँ? वो भी इतना के वजह ही याद नहीं होता आली जनाब को?"
"अरे! सुनो तो! मैंने कहा, झगड़ा इतना होता है कि, यह वाला किस बात पर हुआ याद नहीं!"
"उसके पहले ये भी बोला कि तुम करती हो! मैं सब ध्यान से सुनती हूँ!"
"एक तो तुम सुनती इतना क्यों हो और याद भी इतना कैसे रख लेती हो यह भी मुझे समझ नहीं आता !"
"मजबूरी है! क्या करे? वरना तुम्हारा क्या भरोसा! तुम तो झरना को हौज़-ए-शम्सी कह दो और अपने सारे शुरू किए हुए झगड़े मेरे मत्थे मढ़ दो!"
"अब देखो! तुम अलग-अलग बातों को मत मिलाओ! झरना कभी भी हौज़-ए-शम्सी नहीं हो सकता,ये तो सही है, लेकिन दूसरे वाले बात की possibility आधी तो है ही न!"
"हम्म...... वैसे झगड़े भले ही आधे मैं शुरू करूँ, ख़त्म सारे मैं ही करती हूँ! वरना आली जनाब का बस चले तो झगड़ा हुआ नहीं कि जैसे झोला उठा कर निकल पड़े!!"
"ऐसा कब किया मैंने? कुछ भी मत बोलो तुम अब!"
"तो अभी पिछले हफ़्ते क्या किया था?"
"अरे! वो तो ऐसा हुआ कि तुम पहले पँहुच गई! वरना मैसेज लिखते, डिलीट करते मैं भी बस आ ही रहा था तुम्हारे पास!"

Hahaha sach ye roz roz ke jhagde.... Bahut badhiya... Didi yaad dilwane ke liye ki hum kai baar apne karibi se bina wajah hi ladate rahate hai....or wo ek aadat si ban jaati hai😊
ReplyDeleteBewajha mai kabhi nahi ladti..zaroorat hi nahi padti! Itne saare wajah hai ladne ke ;)
DeleteKoi jhagda bewajh nahi karta.....
ReplyDeletemai toh bilkul hi nahi ;)
Deleteसुनना और झगड़ा करना। दोनों ही ज़रूरी life skill हैं। और यहाँ skill को stigma की तरह देखा जाता है। और झगड़ा ख़त्म करना/conflict resolution को अहमियत ही नही है। सचमुच झगड़े की एंटी वज़ह हैं। और वज़ह पे झगड़ा नही किया तो घुटते रहो फ़िर।।
ReplyDeleteRead एंटी as इतनी
Deleteमुझे तो ये समझ आया, नोक झोक न हो, थोड़ा झगड़ा न हो (एक दूसरे को नोचने वाला नही, वो झगड़ा नही violence है), तो मान लेना चाहिए रिश्ते से सारी उम्मीदे उठ गई हैं। बोलते हम इसलिए नही क्यों के resolution की कोई उम्मीद बची नही।
Deleteसही है।
Deleteवैसे आपके इस झगड़े से.. . मुझे भी अपना वाला झगडा या आ गया😉। कहानी कुछ मिलती जुलती है .. . और कुछ शब्द भी similar है।
ReplyDeleteलेकिन जब ये होता है तो झगडा लगा है और जब पढ़ रही हु तो नोक झोंक लग रहा है। उफ्फ्...
बहुत बढ़िया! कहानी मिलाती रहो ! तब न बात आगे बढ़ेगी!
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