Skip to main content

चुड़ैल की झाड़ू!

"आज सुबह सुबह ही रो ली" 

"उफ़! इसलिए ऐसी आंखे है!! क्यों भाई?"

"अरे मेरा जो घाव है न आते जाते दस बार छू जाता है दिन में और खून रिसता है दिन भर!"  

"तो छूती क्यों हो तुम उसे?" 

"भरा के नहीं देखना नहीं होगा?" 

"नहीं नहीं! तुम्हे देखने की क्या ज़रुरत? बस! बैंडेज बदलवा लिया करो वो इंजेक्शन ट्रे वाले नर्स से शनिवार! छूओ मत! गुज़रो भी मत उधर से!" 

"ठीक बोला! सोचती हूँ शहर ही छोड़ दूँ! इसकी गलियां छू देती है!"

"कहाँ जाएगी? ए जोड़ीदार! वहाँ कौन है तेरा?" 

"कोई भी मेरी राह न देखें! आँख बिछाए न कोई!!"

"तो फिर?"

"पर भूल न गए वो! और मुझे भी भुलाने की ज़रुरत नहीं! ये अच्छी बात है के नहीं?" 

"अच्छा! ये तो बताओ दुखता कहाँ है?'

"दिल में "

"तो जोड़ीदार मेरे! दिल यहीं छोड़ जाना!"

"अरे क्या बात करती हो! सुबह सुबह चढ़ा ली?"

"तो बेकार का जाना है जानेमन! जहाँ जाओ, तेरा पीछा न ये छोड़ेगा सोणिये! भेज दे चाहे जेल में!!"

"उफ़्फ़! कुछ भी रास्ता मत छोड़ो मेरे लिए! मुझे तो जाने कब से पता है तुम जान की दुश्मन हो मेरी!! चुड़ैल की दोस्त चुड़ैल!!"

"हाँ! चलो झाड़ू भी निकाल ही लेती हूँ! घर गंदा पड़ा है!"

"फिर उस झाड़ू पर बैठकर आ जाना दिल्ली!"

"पक्का! बस अभी आई!" 

Comments

  1. Makes me identify with some parts a lot. We negotiate every day anew with such a major loss through memories and meanings strewn through the day, through the house, through the streets of our shared city.

    It is amazing to have fellow witches to talk about these things, who help us dust up things and laugh about them. Thanks for sharing

    ReplyDelete
  2. दिल का दर्द बयां करने का ऐसा लाज़वाब तरीका, जिस से दर्द की बात के साथ साथ ।।।दर्द से राहत ह्यूमर से मिले। जरूरी अभिव्यक्ति और खूबसूरत अंदाज़।

    ReplyDelete
    Replies
    1. Bahut din baad Azizam ka comment mila.. Ladybug khush huyi!! Thank you!!

      Delete
    2. अज़ीज़ दोस्त को ह्यूमर पसंद है। अज़ीज़ दोस्त ख़ुश और मैं भी ख़ुश।।

      Delete
  3. सच मे दुख बया करने के लजावाव अंदाज़ है...
    इसमे दिल भी है
    दर्द भी है और
    अहसास भी
    और झारू वाली चुड़ैल भी
    वाह।।।

    ReplyDelete
    Replies
    1. शुक्रिया प्रियंका!

      Delete
  4. Only those who have undergone extremely painful almost drowning anguish can talk about their pain with humour, and such conversations usually take place between friends-often labelled as witches, witch sisterhood zindabad, I too can identify with this, as always lovely and novel ! ❤️ Reading this created a very sweet pain, coz I can also identify with this. Keep writing , your blogs are very different and valuable, 'Salaam' to your unique skill and prolificity!

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thank you so much Supriya ❤️.. Witch Sisterhood Zindabad indeed!

      Delete

Post a Comment

Popular posts from this blog

ये दिल्ली वाले!

"आज मै तुम्हारे घर आते आते रह गया!" "मेरे घर आ रहे थे? क्यों? हमारी बात तो नहीं हुई थी!"  "अरे सुनो तो! मैंने ऑफिस से जब उबर बुक किया तो  मेरे घर के बदले तुम्हारा घर  का  पता  लिया अपने आप!" "मेरे घर का? ये कैसे? भूख लगी थी क्या तुम्हे?"  "पता नही! फिर लाजपत नगर फ्लाईओवर देख कर समझ आया ये तो कहीं और जा रहा है.. " "ओह हो!"  "हाँ! फिर मैंने जल्दी से एड्रेस चेंज किया! पिछले दिन तुमने जो कच्चे आलू खिलाये थे, वो याद आ गए! ऑटो को बोला, टर्न अराउंड!" "बहुत सही किया! बहुत ही सही!! वरना आलू आज तुम्हारे माथे पर बनते! साल में चालिस दिन खाना खाते हो इधर, एक दिन का कच्चा आलू याद है! उनतालीस दिन का उम्दा पकवान नही! बहुत सही किया ऑटो मोड़ लिया। इधर आना भी मत तुम!"

चोर का इमोशन होता है, पर चुड़ैल का?

"अब मान भी लो!"  "क्या?"  "ये काम तुम्हारा ही है न?" "कौन सा?" "ये फ़ोन गायब होना?" "अरे! मै दूसरे शहर में हूँ! मेरा काम कैसे होगा?"  "सच बताओ!" "नहीं भाई! मानती हूँ के मुझे ही फ़ोन न करो तो फ़ोन की तुम्हे ज़रुरत क्या है, ऐसा लगा था मुझे......"  "वही तो!  अब छुपाओ मत! राज़ खुल गया! ये सब वही है।  तंतर मंतर जादू टोना! अब तो साबित  ही हो गया के तुम ही वो बंगाली चुड़ैल हो जिससे हम बिचारे हिंदी प्रदेश के लोग सदियों से डरते आये है!"  "सदियों से?" "हाँ! हाँ! सदियों से!"  "अच्छा! और ये नहीं सीखाया गया हिंदी प्रदेश के लोगों को के अंधे को अंधा, बहरे को बहरा , चुड़ैल को चुड़ैल नहीं बोलते?"  "नाह! हमे सिर्फ सिखाया गया है के चोर को चोर नहीं, चौकीदार बोलते है! चोर का भी इमोशन होता है आखिर!!" 

तू कौन मैं खामखा!

  "जल्दी से गाड़ी में बैठो! रस्ते में खड़े क्यों हो?" "अरे मैं अमरूद भूल गया।"   "अब रहने दो! वापस तो जा नहीं सकते!" "अरे नहीं! ये तो बहुत ही बुरा है ।  मुझे अमरूद खाना था।" "उफ्फ! बच्चे मत बनो।  कोई मर नहीं रहा बिना अमरूद के।"   "तुम्हें क्या पता? कोई मर जाये तो?"   "अरे छोडो भी अब।" "कैसे छोड़ूँ? अरे अरे!! वो देखो फल का ठेला वहां है।  भैय्या, गाड़ी रोकिये!  मुझे अमरूद लेना है।" "नहीं! नहीं! बिलकुल गाड़ी मत रोकिये, भैय्या! मुझे जल्दी पहुंचना है।  मीटिंग है। हम घर पहुँच जाये तो फिर तुम निकल जाना आम, अमरूद कुछ भी लेने। " "हे राम! ये औरत तो मुझे अमरुद भी नहीं दिला रही है! कितनी ज़ालिम है! भैय्या, अब आप रोक दीजिये बस गाड़ी!"  "अब क्यों? ठेला वाला तो गया।" "अब मैं जमीन में लेट जायूँगा, पैर पटकूंगा, और अपने ऊपर मिट्टी डाल लूंगा!! सब को बताऊंगा ये तो मुझे अमरुद भी नहीं दिलाती है!" "हममम ... रोक ही दीजिये भैय्या गाड़ी फिर! लेकिन १ मिनट के लिए। इसे उतारकर तुरंत भाग जायेंगे - फिर...