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ख़ुश रहो! आबाद रहो!

"ये हमारा अपार्टमेंट है न - हमारी काम-वाली दीदी बोलती है ये बनते हुए एक इंसान मर गया था! और वो  बगल वाले में भी! बोलते है दोनों को रातों रात इमारत के नीचे गाड़ दिया।"

"अच्छा? फिर?" 

"हाँ! फिर उनके कपड़े छुपा दिए, झोपड़ी खाली कर दिया। ढाई तीन महीना बाद घरवाले पूछने आए तो बोले, "वो तो पिछले महीने यहां से छुट्टी करके गाँव को निकला था ! पंहुचा नहीं अभी?"

"हाय हाय!! डराओ मत! "

"बोलते हैं, घर बनाते हुए कोई न कोई ढेर होता है।  हर घर के नीचे किसी न किसी की लाश मिलती है।"

"हम्म्म .. "

"एक आधा  घर के नीचे शायद मेरा भी है!"

"क्या अनाब सनाब बोलती हो तुम भी! गुस्सा करूँ?" 

"नहीं करो।  सुनो बस। मेरी लाश पर बना घर भी होगा दुनिया में। अच्छा एक बात बताओ! घर तो बड़ा सुन्दर दिखता है , लाश को जाकर अगर घर की सुंदरता के बारे में बताएं तो लाश को कैसा लगेगा ?"

"बोला था डराओ मत! अभी फ़ोन बंद हो जाएगा! तब पता चलेगा तुम्हें!

"धमकी?"

"और नहीं तो? देखो! तुम लाश छोड़ो! घर छोड़ो! तुम सुन्दर कितनी  हो ये तो देखो। तुम काजल लगाओ, नैन मटकाओ, गजब ढाओ, ख़ाक डालो दुनिया और उसकी इमारतों पर!! भाड़ में जाए ये।  मेरी बला से।  तुम बनी रहो। आबाद रहो।  ख़ुश रहो।"

"आमीन!"

"सुम्मा आमीन" 

Comments

  1. लाश बोलेगी।।।इस सुंदर इमारत की बुनियाद मैं हूँ। लाश सिर्फ़ नीचे नहीं दबी। के बार तो इमारतों में बसने वाले भी जिंदा लाश होते हैं।। ज़िंदा लाशें ज़्यादा डरावनी है।। ज़िंदा लाश न बनना ही खुश रहना और आबाद रहना है।।

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    1. ठीक कहा! पर लाश तो होते है सुन्दर घरों के नीचे both literally, and figuratively.

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  2. Netflix mai Delhi crime wala series yaad aaya ...Jo ki bahut dil dahlane wala tha.

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  3. शहर है लाशों का, ज़िंदा हो तो खुश रहो,

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    1. और ज़िंदा लाशों के क्या कहने!!

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  4. The idea of city itself is based on greed and exploitation. It is created by kings mostly to attract slaves, isn't it? It requires the constant glare, constant appeasement of egos, justifies discrimination and hunts for constant unending pleasure. No wonder city empties soul of many to build it's own

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    1. True. constant appeasement of ego... justifying unjustifiable acts towards one's own narrow ends...

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  5. This want to delete/erase anything that's not decked up or not upto our beauty standards is killing people. Hardwork ,sweat and even lives which create all that, has no space inside those huge beautiful spaces. Only place where they belong ... Is below the ground.

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    1. Yes.. all we can think of is what needs to be hidden with almost as much indignation as a corpse. Those make us uncomfortable. But how is it to walk on corpses? I often wonder!

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    2. It is so similar to how social media works too.... Even when you are empty inside still,to the outside world you post happy pictures...

      Emptiness inside is compansated through external validation and beautification.. some dead ppl are "Aahuti" to our profit mending machinery. They are not one of us and we are not one of them.

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    3. True. It mirrors our world. No space for softer feelings, wet with dew kind ofsoft feelings but there is only space for happiness/anger/hatred that can shout from rooftops.

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  6. Ye padh kar jinda logon k baare sochne pr majboor ho gyi jo jinda to hain lekin jindagi se ashayein kuch nhi hain....jinda laash hi to hain wo.......Mahila majodoor ko hi le lijiye na koi iksha na asha bas majdoori kar pariwar ki jimmedariyan uthana. Is jimmedari me wo apne aap ko bhi bhool jaati hain.

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    1. haan! Thik kaha aur un gharo ke andar rahne wali mahila majdoor bhi.. wo bhi lash ho jaati hai.. na koyi aas hai, na chahat... jo mil jaye sab badhiya! Kabhi kabhi unhe zinda hi gadh dete hai

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