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Showing posts from 2019

किस्सा क़त्ल ए आम का

"ये बताओ के जान गयी कैसे?"  "तो साहिबान, बात कुछ यूँ हुई के,   कुछ बुँदे वारिस शाह ने बरसाया,  तो कुछ रंग बुल्ले शाह ने मिलाया,  कुछ धीमी आँच खुसरो लाए,  तो कभी सुल्तान बाहु गहरा कर गए हर बात !" "फिर?"  "फिर बच कौन सकता था भला? क़त्ल होना तो तय था!"

प्यार का नाप तौल!

"सुनो! एक पुराना, घीसा-पीटा सा बात बोलूं तुमसे?" "बोलो" "मुझे प्यार है तुमसे बहुत!" "ठीक है। पर मुझे उससे २ ग्राम ज़्यादा!" "ये  क्या बात हुई!! नापा कब था?" "बस! है तो है! समझा करो। मर्द हूँ! मेरा सबकुछ ज्यादा। तो प्यार भी ज़्यादा ही होगा ना?" "फिर तो ज़रूर ऐसा ही है!  अब इस पर कौन सवाल कर सकता है भला!?"

दिल की बातें 😉

"कहाँ हो?" "जहाँ होना चाहिए! रास्ते में!" "अच्छा? अभी रस्ते में होना था? दो बजे पहुंचना था न?" "दो बजे?! पढ़ा नहीं फिर से मैसेज? ढाई बजे बोला था मैंने।" "दो बजे बोला था! ये लो! पढ़ लो मैसेज, खुद ही!" "अरे अरे! मुझे तो यकीन था के मेरे दिल की बातें पढ़ लेती हो तुम! आज पता चल गया नहीं पढ़ पाती! पॉइंट थ्री जीरो दिल में जोड़ा हुआ था।  चूक गई तुम!" "🙄 🙄 🙄 🙄"

पक्का प्रॉमिस!!

"वैसे चेक किया था तुमने? रेस्टोरेंट खुला होगा रात को?" Being high is like... "बोला तो था, फ़ोन किया था उन्हें! पढ़ती नहीं हो तुम मेरा मैसेज!"  "ओह हो! पकड़ी गई क्या?"  "देखो! आज पकड़ लिया! वैसे शक तो मुझे पहले से ही था!" "बिलकुल सही पकड़ा तुमने! एकदम सच बताऊं ? पढ़ती तो मैं कभी भी नहीं हूँ! बस आज पकड़ी गई!"  "दुखी कर देती हो तुम!"  "अरे अरे! दुखी क्यों होते हो? फिर नहीं पकड़ी जायूँगी!" "पक्का?"  "पक्का!!! प्रॉमिस!" 

दिल पर दराती

"तेरे आस पर जिए हम /तो ये जान झूठ जाना! चाचा ग़ालिब माफ़ करेंगे मेरी ये गुस्ताखी!  तुमने मेरे दिल पर दराती जो चलाई!" "किस बात पर चली दराती?" "मेरे इतने सुन्दर फोटो पर ऐसी कटुक्ति! दराती नहीं चलेगी?" "बस!? इतनी सी बात पर दराती चल गयी? ये तो कुछ भी नहीं था।दराती चलाने में मुझे ख़ास महारत हासिल है! चलेगी दराती भी।  तुम बस बनी रहो!" "न बाबा! माफ़ करो! रहम करो मुझ पर! चुनौती लगा क्या ये तुम्हे?"  "और नहीं तो?"  "अरे अरे! देखो, जिन पर तीर-नीम-कश चलाया जाता है उन को दराती के मामले में ढील मिलनी चाहिए!" "अच्छा? ऐसा है क्या? चलो मान जाता हूँ। वरना इधर दराती पे धार देना शुरू भी कर दिया था!"  "बताओ! गाना गाना पड़ जाता अभी! " "कौन सा?" "ना तो चक्कुओं की धार/ ना दराती, ना कटार/ ऐसा काटे के दांत का निसान छोड़ दे.. etc etc   ऐसे जालिम को छोड़ देने को कहा गुलज़ार ने  ..... "  "हम्म्म! चलो! जालिम तो तुम हो ही और गुलज़ार का नाम भी आ गया! छोड़ दिया! बच गयी तुम!  "  

भूलक्कड़ी

"अरे क्या सब आजकल करती हो न तुम! बहुत ही ख़राब है ये!"  "क्यों? मैंने क्या किया?"  "अरे कल जो हम सेंटर गए थे, मेरा चार्जर लाना याद दिलाया तुमने? चार्जिंग पॉइंट पर लगा हुआ था न?"  "मुझे बोलना था? ओह हो! फिर तो बड़ी गलती हो गयी मुहसे! हाथ जोड़ने लायक गलती!" PC: Google "और नहीं तो क्या! अब बताओ! जाना पड़ेगा मुझे एकदिन वापस लाने!" "हाय! मेरी वजह से तुम्हे कितनी तकलीफ होगी! सिर्फ मेरी वजह से.... " "और नहीं तो क्या? हसो मत! तुम्हे अगर याद रहता के मुझे कुछ याद नहीं रहता तो इतना कुछ करना नहीं पड़ता!"  "हाँ यार! मैं दिन ब दिन बहुत ही भूलक्कड़ बनती जा रही हूँ!" "वैसे उम्र भी तो हो रहा है!"  "बहुत शुक्रिया इतने कन्सिडरेट बनने के लिए! हम वैसे एक ही उम्र के है!"  "क्या बात करती हो! मैं तुमसे पूरा दश महीना छोटा हूँ! खुद बुढ़िया हो रही हो तो मुझे भी बना दो बस! ये सब चाल मुझे खूब पता है! मैं बूढ़ा नहीं होने वाला तुम्हारे साथ!" "उफ़! माफ़ कर दो मुझे! ऐसी गलती फिर नहीं होग...

शर्म से ब्रेक-उप

"तुम फिर से सिगरेट पी रहे हो?"  "हाँ यार!" "अरे अरे! आराम से हाँ भी बोल रहे हो देखो! शर्म नहीं आती?"  "नहीं यार! उसने आजकल बिलकुल आना छोड़ दिया है!  लगता है,  नाराज़ हैं !" "मनाया नहीं?" "बहुत मनाया! बहुत बोला, कभी कभार तो आ जाया करो! मानती ही नहीं!" "लगता है तुम लोगों का ब्रेक-अप हो गया है!" "हाँ यार! तभी तो देख नहीं रही हो, सिगरेट भी बढ़ गया है मेरा!"

शर्म गई दुनिया घूमने!

"दूसरे तरफ क्यूँ देख रही हो?" "ऑफ़ हो! गाना अभी ख़तम होने ही वाला था! ज़रा सब्र नहीं है!"  "क्या मतलब? मेरे आ जाने के बाद भी गाना चालू रखा?" "हां! क्यों नहीं ? बोला न, गाना ख़तम होने ही वाला था। "   "शर्म करो! शर्म तो औरत का गहना होता है!" "अरे गहने तो कब के बेच दिए जानेमन! वरना दुनिया कैसे देखती?" "वाह वाह!! क्या बात की है! ये तुम्हारा तक़िया कलाम है?" "अरे नहीं!  ताज़ा परोसा ।  लुत्फ़ उठालो! चावल भले ही पुराना ख़िलाऊ तुम्हे, बातें हमेशा फ्रेश!"  "बद्तमीज़ हो तुम!"  "हाँ! बद्तमीज़, बेबाक, और बेशरम भी!"  

मटन बनाने का असली तरीका!

"मटन बनाने का तरीका खास ही होता है! आज कल के बच्चे तुम क्या जानो मटन कैसे बनता है?" बाबा बोले। "आप बनाएंगे?" "बिलकुल! खास मौका भी है!" "अच्छा! तो प्रेशर कुकर निकाल दूँ?" "यही तो गड़बड़ है तुम लोगो में! प्रेशर कुकर ने सारा खाना खराब कर रखा है! मैं  कढ़ाई में पकायूँगा! " "ओके बाबा! तो पहले क्या करना है आपको?" "कढ़ाई चढ़ाओ और तुरंत तेल डालो!" "कढ़ाई गरम होने से पहले ही? मटन चिपक जायेगा!!" "उफ़! तो गरम कर लो! सब मैं ही बतायूँ? ओह हो ! इतना तेल मत डालो!" "पर बाबा! मटन है! तेल तो चाहिए न?" "अरे अरे! रियाज़ी खासी नहीं लाये तुम? फिर डालो तेल!! हमारे ज़माने में तो रियाज़ी के बग़ैर मटन लाया ही नहीं जाता था!", बाबा एकदम हताश थे मेरे इस लापरवाई से! मैंने इग्नोर किया! "अब क्या डालना है आप को?" "चीनी! कलर अच्छा आना चाहिए!" "आलू डालना था न मटन में?" "हाँ, तो?" "तो पहले वो नहीं भूनेंगे? " "ओके ओके! भून लेते हैं!"...

ला-जवाब!

"पता है मुझे सबसे ज्यादा ख़राब क्या लगता है?" "क्या?" "ये जो तुम मेरे बातों का जवाब नहीं देते हो!"  "हाहाहा! बस इतनी सी बात! वैसे लोग कहते है, मेरा जवाब नहीं!" "अच्छा!! ला-जवाब वैसे इस वक़्त मैं  साबित हो रही हूँ! बोलती तुम्हारी बंध है!" "वो तो ऐसा है के तुम जब चहकती हो, तो उसकी महक में, मैं थोड़ा बहक जाता हूँ! वरना.... "  "वरना...मैं समझ गई!  तुम्हारा जवाब नहीं!"

मर जाओ तुम!

" ये जगह याद है ?" "कुछ ख़ास है?" "हाँ! यहां तुमने मुझे पिछले साल मर जानेको कहा था!" "सच? अरे नहीं ! मैं तुम्हे मर जानेको कैसे बोल सकता हूँ?"  "'मर जाओ तुम! बस मर जाओ!' ऐसे बोला था!" "क्यों?" "वो तुमने पूछा था मैंने शेक्सपियर पढ़ा है के नहीं? तो मैंने ना बोला!" "अब पढ़ा? साल बीत गया" "नहीं यार!" "मर जाओ तुम! बस मर जाओ!" 

चुना लग गया?

PC: Google पानवाला: "क्या बोला आप ने?"  खरीदार: "बोला, दे दो माचिस! प्यार से बोला भाई!" पानवाला: "अब प्यार किसने देखा है! भूत प्रेत जैसा है वो भी!" खरीदार: "बातें बनाओ अब तुम!" पानवाला: "हाँ! और काम ही क्या है मेरा! कभी बातें बनाता हूँ, कभी चुना लगाता हूँ! "

आख़िर में होगी तो भैरवी ही!

"तुम्हे मेरी पसंद पर भरोसा क्यों नहीं है ? मैं क्यों नहीं कुछ खरीद सकती तुम्हारे लिए?" 'अरे! तुम फ़िरकी मत दिया करो बातों को।  पसंद पर भरोसा नहीं कब बोला? तुम्हारी फ्लाइट कब की है बताओ!" "नहीं बताती! मेरे बातों का जवाब मत दो और अपनी मर्ज़ी की बातें करो! जम्हूरियत के खिलाफ हो तुम!" "उफ़! अब जम्हूरियत के भी खिलाफ हो गया मैं? बस! आ जाओ अब! झंडे गाढो! धरने पे बैठो!" "हममम वैसे मुझे समझ आ गया मेरे पसंद पे भरोसा क्यों नहीं कर सकते! जो तुम्हे पसंद करे, उसके पसंद का क्या भरोसा?" "अब आया नया पेच! अब ये बात कहाँ से आयी ?" "यकीनन यही बात है! तुम्हे पसंद करने वाली के पसंद पर भरोसा? तौबा! तौबा!" "अब ठुमरी गाओ तुम इस पर.... राग अलापो" PC: Google "सिर्फ वही क्यों? बड़ा ख़याल भी गायूंगी! दो बंदिश वाली! अभी तो बस आलाप है! तबले का इंतज़ार करो तुम!" "उफ़! हर बात पर इतने पेचीदा मुरकियाँ मत लिया करो! नहीं जचता!" "ये तो महफ़िल में आने  से पहले सोचना था जानेमन! अब आये हो तो रस्म अदायगी त...

कारोबार ए ज़िन्दगी

"ये तुम गोद में बैकपैक लेकर क्यों बैठी हो? " "तो क्या सर पर रख लूँ?" "सामने वाले सीट पर।  सुमित भाई, नज़र रखियेगा! मैडम के हीरे है इसमें।" "ओके सर" "सिर्फ हीरे है उसमे मेरे?" "ऑफ़ हो! गोल्ड का कारोबार भी शुरू कर दिया तुमने? छोड़ क्यों नहीं देती तुम ये सब!" "छोड़ दूंगी तो खायुंगी क्या? पापी पेट का सवाल है बाबा!" "अच्छा!! चलो! नशीली दवाई का धंदा तो छोड़ दो।  देश का फ्यूचर खराब हो रहा है!" "अब मैंने किसीको थोड़े ही न बोलै है इस्तेमाल करने को! सब अपने मर्ज़ी के मालिक है!" "फसोगी एकदिन तुम!" "फस तो कब का चुके है जानेमन!" "वैसे सुमित भाई के ब्रदर पुलिस में है! छुड़ा लेंगे! क्यों सुमित भाई ?" "हाँ सा'ब! बस मैडम को बोल दो बुलंदशहर में पकड़ी जाये! बाकि मेरा भाई सम्हाल लेगा!" 

ये और वो का इश्क़!

" क्या यार!    ये सब शायरी मत सुनाओ!    अब जब लहू आंख से बहने लगा है , तुम कहते हो कि काला चश्मा पहना करो,   जचता है?    वारिस शाह , बाहू के बाद कहाँ ये चवन्नी छाप शायर न चलेंगे !" " वाह वाह!    ग़ज़ब की लफ़्फ़ाज़ी है मियां  ......  लाज रख लिया तुमने मेरा !" " तुम हल्के में मत लो मुझे !" " वही देख रही हूँ मैं ! नहीं ले सकती " " लहू वाक़ई आँखों से टपकेगा एक दिन ! उसी लहू के दीये जलायोगी तुम ! चिराग - ए - अश्क़ " " ओय होए ! और फिर दास्तानगोई होगी। उस दीये के सामने बैठ कर।   एक था ये और एक थी वो !"  " लफ़्फ़ाज़ी में माहिर ! हाज़िर - जवाब जोड़ी ! इनका कोई ब्रांच न था ! न होगा !" " वैसे अच्छे भले थे दोनों ! सनकी ! सही से सठिया रहे थे।   चालीस के उस पार के लोग अक्सर जैसे होते है ! फिर अचानक एक दिन मिल गए ग़ालिब को गरियाते पुरानी दिल्ली की किसी गली में !" " ये था निहायती निकम्मा ! जिसे ...

दिल्ली का चुनाव

ऑटो में ...  मैडम, तो इस साल आप करने का क्या सोच रहीं है, दिल्ली में?  मैडम: भैय्या सोचेंगे तो तब, जब ज़िंदा बचेंगे। आप गाड़ी धीरे चला लीजिये!!  ड्राइवर: डरते क्यों है मैडम! वैसे हम तो इस बार कमल खिलाएंगे दिल्ली में!  मैडम: अच्छा! ऐसा क्यों? कमल ने क्या कमाल किया है दिल्ली में? ड्राइवर: मैडम समझती नहीं है आप! संविधान को बदलना है ! मैडम (अब अच्छा खासा डरे हुए आवाज़ में): कमल संविधान को बदल देंगे? और बदलना क्यों है?  ड्राइवर: पुराना हो गया है! PC: Google मैडम: और गीता को?  ड्राइवर: उसका  क्या ?  मैडम: मैंने सोचा गीता तो और भी पुराना हो गया है! तो उसको भी लगे हाथ बदल डालते है।  ड्राइवर: क्या मज़ाक करते हो मैडम!  मैडम: शुरू किसने किया था?

देश में निकला होगा चाँद

" चाँद चुराके लाया हूँ .. ला ला ला "  " यह अजीब से लोगोके फोटोज क्यों भेजा जा रहा है मुझे ?" " अरे अरे ! रेसिस्ट हो तुम ! चाँद देखना चाहती थी तुम दूर देश से। भेजा तभी तो ! तो यह लोग भी किसी न किसी का चाँद है !" " होंगे ! उससे मुझे क्या ! और इसमें रेसिस्ट क्या है !" " अच्छा रेसिस्ट न सही क्लासिस्ट तो है ही ! नही तो भड़क क्यों जाती ऐसे ? बता दूँ इनको के इनके चाँद होने से तुम्हे इंकार है ?" " पूरी बात बताना ! बोलना , ' भाईसाब ! ये  मुझे प्यार से कभी कभी चाँद बुलाती है ( मेरे शक्ल पे मत जाईए ! प्यार अँधा होता है )! दूर देश में है और फोटो मंगवाया था चाँद का ! मैंने आपलोगो का भेजा। बोला , आप में से किसीको भी चाँद मान लिया जाये , तो भड़क गई !'   फिर देखो क्या बोलते है यह लोग !" " तुम भी ना ! अब इतनी बातें कौन करे अनजान लोगों से ! तुम तो जानते ही हो मैं  ज्यादा बा...