"जामा मस्जिद के आस पास जाते ही बस मैं, मैं नहीं रहता, तुम हो जाता हूँ!”
"कैसे?"
"मेरे मैं का मुझे अलग से पता ही नहीं चलता! चिपक जाती हो तुम मुझसे! एकदम!”

"उन पतली गलियों में सीलके चलना आसान है न?"
"वैसे खुदको तुमसे सीला हुआ सा पाता हूँ मैं हर सुबह! बुनती रहती हो मुझे हर घड़ी कोई नए ही नक़्शे में। ये सब कर क्या रही हो तुम? वो ही? तंतर मंतर? जादू टोना?"
"अच्छा मानो कभी अलग होना हुआ तो? क्या हम बुने हुए स्वेटर की तरह उधेड़े जाएंगे ?"
"उफ़! दुनिया भर की अनाब सनाब बातें! काम नहीं है तुम्हे आज? बातों में उलझा के बस निकम्मा बना दो मुझे! चाचा ग़ालिब की तरह! चलो! अब इतनी बातें मत करो! "
"कैसे?"
"मेरे मैं का मुझे अलग से पता ही नहीं चलता! चिपक जाती हो तुम मुझसे! एकदम!”

"उन पतली गलियों में सीलके चलना आसान है न?"
"वैसे खुदको तुमसे सीला हुआ सा पाता हूँ मैं हर सुबह! बुनती रहती हो मुझे हर घड़ी कोई नए ही नक़्शे में। ये सब कर क्या रही हो तुम? वो ही? तंतर मंतर? जादू टोना?"
"अच्छा मानो कभी अलग होना हुआ तो? क्या हम बुने हुए स्वेटर की तरह उधेड़े जाएंगे ?"
"उफ़! दुनिया भर की अनाब सनाब बातें! काम नहीं है तुम्हे आज? बातों में उलझा के बस निकम्मा बना दो मुझे! चाचा ग़ालिब की तरह! चलो! अब इतनी बातें मत करो! "
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