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जामा मस्जिद


"जामा मस्जिद के आस पास जाते ही बस मैं, मैं नहीं रहता,  तुम हो जाता हूँ!”

"कैसे?" 

"मेरे मैं का मुझे अलग से पता ही नहीं चलता! चिपक जाती हो तुम मुझसे! एकदम!”



"उन पतली गलियों में सीलके चलना आसान है न?" 

"वैसे खुदको तुमसे सीला हुआ सा पाता हूँ  मैं हर सुबह! बुनती रहती हो मुझे हर घड़ी कोई नए ही नक़्शे में।  ये सब कर क्या रही हो तुम? वो ही? तंतर मंतर? जादू टोना?"

"अच्छा मानो कभी अलग होना हुआ तो? क्या हम बुने हुए स्वेटर की तरह उधेड़े जाएंगे ?" 


"उफ़! दुनिया भर की अनाब सनाब बातें! काम नहीं है तुम्हे आज?  बातों में उलझा के बस निकम्मा बना दो मुझे! चाचा ग़ालिब की तरह! चलो! अब इतनी बातें मत करो! "

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ये दिल्ली वाले!

"आज मै तुम्हारे घर आते आते रह गया!" "मेरे घर आ रहे थे? क्यों? हमारी बात तो नहीं हुई थी!"  "अरे सुनो तो! मैंने ऑफिस से जब उबर बुक किया तो  मेरे घर के बदले तुम्हारा घर  का  पता  लिया अपने आप!" "मेरे घर का? ये कैसे? भूख लगी थी क्या तुम्हे?"  "पता नही! फिर लाजपत नगर फ्लाईओवर देख कर समझ आया ये तो कहीं और जा रहा है.. " "ओह हो!"  "हाँ! फिर मैंने जल्दी से एड्रेस चेंज किया! पिछले दिन तुमने जो कच्चे आलू खिलाये थे, वो याद आ गए! ऑटो को बोला, टर्न अराउंड!" "बहुत सही किया! बहुत ही सही!! वरना आलू आज तुम्हारे माथे पर बनते! साल में चालिस दिन खाना खाते हो इधर, एक दिन का कच्चा आलू याद है! उनतालीस दिन का उम्दा पकवान नही! बहुत सही किया ऑटो मोड़ लिया। इधर आना भी मत तुम!"

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