"कल्लू निहारी बन्ध हो गया था आज, तो वहां खाया जहाँ तुम ले गई थी।हिलाल। अच्छा बना लेता है वो भी!"
"हाँ! अच्छा बना लेता है! और याद है हमने वापस आकर निहारी पर बात की थी! के मैं बनाती हूँ।"
“हाँ! फोटो दिखाया था! अब जब खाऊंगा तब जानूंगा कैसा हैं!”
"क्या बात करते हो! खाया तो था!"
“कब?"
"अरे! साथ में मालपुए भी थे।"
"उम्म्म्म। ... तारीख बताओ!"

"खाना याद नहीं, तारिख से याद आएगा? एक पराठा बनाके सात फोटो दिखाते हो खुद! और मेरा सात घंटे में बनाया हुआ
निहारी याद नहीं जनाब को!"
"और भी बनाता हूँ ! एग करी, चिकन करी!! पराठे पे क्यों रुक गई?"
"अच्छा!! ये सब कब बना?"
"बद्तमीज़ हो तुम! याददाश्त गई तुम्हारी! बेच दो उसे! बीस रुपया मिलेगा शायद। पेप्सी पी लेना!"
"सही है! तुम भी आ जाना! आधी आधी पी लेंगे। तुम्हारी बेच के तो शायद बीस भी न मिले!"
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