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आख़िर में होगी तो भैरवी ही!


"तुम्हे मेरी पसंद पर भरोसा क्यों नहीं है ? मैं क्यों नहीं कुछ खरीद सकती तुम्हारे लिए?"

'अरे! तुम फ़िरकी मत दिया करो बातों को।  पसंद पर भरोसा नहीं कब बोला? तुम्हारी फ्लाइट कब की है बताओ!"

"नहीं बताती! मेरे बातों का जवाब मत दो और अपनी मर्ज़ी की बातें करो! जम्हूरियत के खिलाफ हो तुम!"

"उफ़! अब जम्हूरियत के भी खिलाफ हो गया मैं? बस! आ जाओ अब! झंडे गाढो! धरने पे बैठो!"

"हममम वैसे मुझे समझ आ गया मेरे पसंद पे भरोसा क्यों नहीं कर सकते! जो तुम्हे पसंद करे, उसके पसंद का क्या भरोसा?"

"अब आया नया पेच! अब ये बात कहाँ से आयी ?"

"यकीनन यही बात है! तुम्हे पसंद करने वाली के पसंद पर भरोसा? तौबा! तौबा!"

"अब ठुमरी गाओ तुम इस पर.... राग अलापो"
PC: Google
"सिर्फ वही क्यों? बड़ा ख़याल भी गायूंगी! दो बंदिश वाली! अभी तो बस आलाप है! तबले का इंतज़ार करो तुम!"

"उफ़! हर बात पर इतने पेचीदा मुरकियाँ मत लिया करो! नहीं जचता!"

"ये तो महफ़िल में आने  से पहले सोचना था जानेमन! अब आये हो तो रस्म अदायगी तो होगी!"

"हार मान लिया! जाओ भाई! ले लो जो भी तुम्हे मन करे!"

"ये हुई न बात! जैसे भैरवी की बंदिश! जिसके बाद कुछ और गा नहीं सकते!"  

Comments

  1. Always joyful to reach your blogs Nayana ji.
    Love the way you try to pen these day to day life incidents and different moods of a common man and, how our life evolves around such emotions.
    Your choice of scenarios are extremely lovely and, you do really well by adding some flovours of different emotions to it.

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